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धरती पर कैसे जली आग ? - Indian History Blog I Vishwa Guru Bharat I

संसार के विभिन्न देशों में आग और उसके अविष्कारक से सबंधित अनगित पौराणिक कथाएँ (मिथक) आज भी प्रचलित हैं, जो बाहतः अत्यंत ही दिलचस्प हैं पर सारतः हैं काफी गंभीर व महत्वपूर्ण। इन्हें मात्र कपोल-कल्पना नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन मिथकों की रचना, उन आदिम लोगों ने की, जो संसार का बोध पाने, उसे समझने, उसमें अनिवार्य संबंध देख पाने तथा कार्य-करण संबंध ढूंढ पाने की कष्टसाध्य कोशिश कर रहे थे।
    ग्रीक आख्यानों में प्रोमैथ्यूज का उल्लेख मिलता है, जो अग्नि को स्वर्ग से चुराकर मृत्यु लोक में लाया था। वास्तव में प्रोमैथ्युज ग्रीक पुराण कथाओं का महान् सांस्कृतिक नायक है, जो टिटन आयोपेटस व क्लाईमीन का पुत्र और एटलस मेनोईटस व एवी मैथ्युज का भाई था। इसोइड ने उसकी कथा इस प्रकार कही है- एक बार ज्यूस के शासन के अधीन देवताओं और मनुष्यों के बीच मैकोन में यह विवाद उठा कि बलि-पशुओं का कौन सा अंश देवताओं को अर्पित किया जाए। प्रोमैथ्यूज ने ज्यूस की परीक्षा लेने हेतु एक बैल को मारकर उसके सवोत्तम अंश को गोबर से ढक दिया तथा दूसरी और केवल हड्डियों की चर्बी से ढक कर रख दिया। ऐसा करने के बाद ज्यूस से चुनाव करने के लिए कहा गया किन्तु जब उसकी समझ में यह कपट जाल आया तो उसने मांस फेंकने के लिए आग को बाहर निकाला, लेकिन साथ ही साथ उसने यह वर्जना भी रखी की पृथ्वीवासी आग का इस्तेमाल न करें। यह देख प्रोमैथ्युज चालाकी से एक खोखली नली में अग्नि चुराकर धरती पर ले आया।
    कुछ भारतीय विद्वानों का मानना है कि ग्रीक आख्यानों का यह नाम, प्रोमैथ्यूज का उद्भव संस्कृत पद प्र$मंथ से हुआ है। क्योंकि अग्नि का आर्विभाव पहले मंथ प्रक्रिया से किया गया था। इस आधार पर उसके विश्लेषण के अनुसार, प्रोमैथ्यूज के नाम से संबंध पुराण-कथा का उद्भव भी भारत में हुआ और यहीं से विदेशों में फैली, इस सदंर्भ में चैम्बर्स विश्वकोश में दी गई बातें ध्यान देने योग्य हैं।
    ग्रिफिथ के अनुसार (जिसने यजुर्वेद के मंत्रो का अनुवाद किया था) .............. आप पुरीष्य (पशु-पोषक) है, विश्व-भर के आश्रम हैं, अर्थवन ने ही, हे अग्नि! सबसे पहले आपका मंथन किया था। हे अग्नि! अर्थवन ने कमल से मंथन करके पुराहित विश्व के सिर पर तुम्हारा आर्विभाव किया था। ‘त्यागमग्ने पुरूष्करादध्यथर्वा निरमंथत। मूघ्नो विश्वस्य बाधतः’ (ऋ 6.16.13, यजु. 15.22)
 अर्थवन या अथर्वा, जिन्हें अंगिरस भी कहा जाता है, संभवत आग के पहले आविष्कारक थे। इसीलिए उनका नाम अंगिरस हो गया। उनके नाम पर अग्नि का मंथन करने वालों की पूरी जाति अंगिरस के नाम से विख्यात हुई। आज भी भारत में इस गोत्र के लोग मौजूद हैं। यह भी कहा जाता है, उसका हिन्दी भाव इस प्रकार है-
    यजुर्वेद के श्लोक (8ः56) पर ग्रिफिथ की, जो टिप्पणी है, उसका हिन्दी भाव इस प्रकार है-
    अर्थवन एक प्राचीन ऋषि, जिसने सर्वप्रथम आग की खोज की तथा अग्नि की पूजा शुरू करवाई। इनके द्वारा अग्नि की खोज किए जाने के बाद बहुत से अंगिरस गोत्रीय आग के मंथनकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए, जिनकी चर्चा वेदों में अनेक जगह की गई है। उस समय लकड़ी से सफलतापूर्वक आग निकालना आसान काम नहीं था।  इसलिए तत्कालीन समाज मंे अंगिरसों की बड़ी आवभगत होती थी।
    इस संदर्भ में विल्सन का कहना है कि ऋग्वेद में अंगिरस शब्द का प्रयोग अग्नि के पर्याय के रूप में किया गया है, जबकि उनका नाम मनुस्मृति तथा सभी पुराणों में एक ऋषि या प्रजापति के रूप में किया गया है, उनके ब्रह्मा का एक रूप आदिम मानुसपुत्र बताया गया है।
    यदगदाशुषे त्यमग्ने भद्रं करिष्यसि। तयेत्तत् संत्यमडिगरः। (ऋ. 1.1.6)।
    मनुष्यमदग्ने अगिरस्मर्दागरा ययाति वत्सदने पर्ववच्छुये।। (1.31.17)
अर्थात् हे, विशुद्ध अग्नि, तुम चलते रहो, वेदी सदन के सम्मुख जाओ, जैसे मनु, अंगिरस ययाति और अन्य लोग पहले जाया करते थे।
    महाभारत में एक कथा है, जिसमें अग्नि को ‘सह’ बताया गया। राजा भरत के पुत्र नियम के दाह-संस्कार के समय अग्निदेव समुद्र में जाकर छिप गए। वास्तव में वह नियत के दाह-संस्कार में हिस्सा लेना नहीं चाहते थे। जब देवताओं ने यह देखा कि अग्नि गायब है तो उनकी खोज में निकले। घूमते हुए धरती पर पहुँचे। उन्होंने अर्थवन को यह काम सौंपा। कठिन परिश्रम के बाद अर्थवन ने लकड़ी से अग्नि पैदा की तथा देवताओं का काम चलाया।
    भारत की तरह टोगा द्वीप-समूह में, जो प्रचलित धारणा है, वह भी यथार्थ के निकट लगता है। इस द्वीप समूह में आज भी ऐसा कहा जाता है कि भूकम्प के देवता ही आग के देवता हैं। मंगाइयों में अनुरूुति के महान् माउई नरक में गया, जहाँ उसने दो लकडि़यों को रगड़कर आग पैदा करने के रहस्य का पता लगाया। माओरी जाति के लोग इसे दूसरी तरह कहते हैं। उनके अनुसार, माउईने बुढ़ी, दादी माहुईका से आग प्राप्त की, जिसने अग्नि अपने हाथ के नाखूनों से निकाली थ।
    फिनलैंड की प्राचीन कविताओं में पाया जाता है कि सूरज का बेटा-आग स्वर्ग से नीचे ले आया। एस्तोनियों में प्रचलित दंतकथा के अनुसार, वहाँ के स्थानीय देवता उक्को ने अपने लोहे के डंडे से पत्थर पर चोट करके अग्नि पैदा की। वेस्टर्न प्वाइंट, विक्टोरियों के आस्ट्रेलियावासियों में यह धारण प्रचलित है कि भले बूढ़े पुणदिल ने अपने संदूक का द्वार खोल दिया और उसका प्रकाश धरती पर पड़ा। भले आदमी का लकड़ी कराकोरक ने जब धरती को सांपो से भरा हुआ पाया तो वह सांपो को नष्ट करती हुई हर जगह गई पर इसके पहले कि वह सभी सांपो का नाश कर पाती, उसकी लाठी दो हिस्सों में टूट गई। उसके टूटते ही उससे आग की ज्वाला निकली। फारसी के ‘शाहनामा’ में भी आग की खोज करने वालों को, नागों को मारने वाला बताया गया है। प्रतापी नायक हुर्शेक ने भयानक सांप के ऊपर बड़ा भारी पत्थर फेंका, जो सांप के एक ओर हट जाने से एक दूसरी चट्टान से जा टकराया और उससे चिंगारियां फूट पड़ी। पेरूवासियों के पिता गुना मानसुरी ने गुलेल से पत्थर फेंक कर बिजली और गरज पैदा की थी।
    ऊपर जितनी भी बातें आई हैं, उसका संबंध प्राचीन मिथकों से हैं। इनमें सच्चाई की मात्रा कितनी है, निर्णय के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन लगभग सभी कथाओं में घर्षण से आग उत्पन्न करने की बात दिखती है, जो वास्तविकता भी है। क्योंकि आज से हजारों वर्ष पहले ‘होमोइरेक्टस’ (सीधा तना हुआ मानव) घर्षण से आग पैदा करता था। इससे पुरातत्वेता व इतिहासज्ञ भी मानते हैं। रही बात अग्नि के आविष्कारक की, तो इस संदर्भ में कई भारतीय इतिहासकारों का दावा है कि वास्तव में अंगिरस ने ही सर्वप्रथम अग्नि का आविष्कार किया।

-सुभाष सरकार