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हमारे देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 में सैनिको के अतिरिक्त किसानों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। उत्पीड़न एवं शोषण के विरूद्ध किसान और उनके बेटे से सेना में सेवारत थे, इस क्रांति के मुलाधार थे। जनपद बागपत के ऐतिहासिक ग्राम बिजरौल के कुल्ली पट्टी में एक किसान परिवार में महान क्रांति पुत्र बाबा शाहमल का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम चौ. अमीचन्द था। प्राप्त जानकारी के अनुसार इनका जन्म 1797 ई. में हुआ था। इन्होंने दो विवाह किए, पहली पत्नी राजवन्ती जो ग्राम नान्दनौर (हरियाणा) के चौ. रामसुख की सुपुत्री राजवन्ती थी, जिससे तीन पुत्रिया उत्पन्न हुई। दूसरा विवाह ग्राम हेवा (बागपत) के चौ. किशनलाल की पुत्री धन्नों के साथ हआ, जिससे गरीब, बिलसुख और मैदा नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। दिलसुख का शाहमल के साथ विशेष लगाव था। फलस्वरूप उसका पुत्र लिज्जाराम प्राय अपने वादा शाहमल के साथ छाया की भांति सदैव उनके साथ रहता था। वह भी अपने बाबर की तरह स्वाभीमानी और राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत था। दादा शाहमल के बाद क्रांति की बागडौर उसी ने संभाली थी। शाहमल ने स्वाभीमान, मातृभूमि के प्रति प्रेम और किसानों के हित की भावना अत्यन्त प्रबल थी। किसानों का दमन-शोषण और उनसे लूट खसोट उसे असहृ थी। क्षेत्र के असंतुष्ट जमीदार और काश्तकार ब्रिटिश अधिकारियों, व्यापारियों और उनकी जमीन को कुर्की में खरीद लेने वाले व्यक्तियों तथा सुदखोर महाजनों के विरूद्ध उसके मन में प्रचंड विद्रोहाग्नि जला दी थी। चौरासी (देश) के ग्रामीण अपनी खाप की बैठकों में इन परेशानियों की चर्चा करते थे और किसानों को एकजुट करने का प्रयास करते थे। शाहमल इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। शाहमल 84 (वंश) की खाप की बैठकों में यह स्पष्ट करने से नहीं चूकता था कि इन सारे कष्टों की जड़ अंग्रेजी राज है और इनके खात्मे से ही दुःख दर्द दूर हो सकते है। लोक-बातों में इस साक्ष्य की पुष्टि होती है कि शाहमल की चौरासी गांव मेें कडी पकड थी और ये उसके नेतृत्व किसी भी सीमा तक जाने को तैयार थे।
    11 मई 1857 ई0 से 21 जुलाई तक के उनके क्रिया-कलाप एवं शहादत ने जाट जाति और सामान्यता सभी किसानों को आत्म सम्मान, मरने-मिटने की जिजीविषा तथा देशभक्ति की प्रबल भावना से ओत-प्रोत कर दिया था, जिस ब्रिटिश शक्ति को भारत के राजा महाराजा अजेय मान कर उनके पिछलग्गू बने हुए थे। बाबा शाहमल ने  अपने क्षेत्र में सीमित साधनों से अपने उत्सर्ग, स्वाभीमान और शौर्य से उस शक्ति को भयभीत कर दिया था।
    दादा शाहमल बुद्धिमान होने के साथ-साथ परिश्रमी किसान, कुश्ती व घुड़सवारी के शौकीन और गरीब किसानों के हमदर्द थे। छोटी उम्र में ही उनमें राष्ट्रीय भावना हिलौर लेने लगी थी। आस पास के ग्रामीण अपनी समस्याओं को लेकर आने लगे थे। क्षेत्र की चौधराट बाबा शाहमल को मिल गई थी। समीप का गांव बिजवाडा इनका रजवाडा राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया था।
    बड़ौत का क्षेत्र सुमरू बेगम की रियासत सरचना के अन्तर्गत आता था। उसका दीवान राव हरवंश सिंह त्यागी जाटोें की अपेक्षा करता था और अपने समर्थकों तथा जाति भाईयों पर कम लगान निर्धारित करता था। जाट किसान सीधे-सच्चे एवं कुशल तथा परिश्रमी थे तथा कृषि उत्पादन में निपुणता के कारण अन्य वर्गो से आने थे। पक्षपातपूर्ण तथा अपमानजनक व्यवहार के कारण दीवान हरवंश सिंह जाटों में काफी अलोकप्रिय हो गये थे। फलस्वरूप 1825 ई. में यामनौली के किसानों ने दीवान हरवंश सिंह की हत्या कर दी थी। दीवान हरवंश सिंह की हत्या के बाद उसका पुत्र राव देवी सिंह दीवान नियुक्त किया गया। देवी सिंह ने अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध स्वरूप 100 से अधिक जाट किसानों को जमीन से बेदखल कर दिया और उनकी भूमि पर बेगम का अधिकार हो गया। किसानों ने दादा शाहमल के नेतृत्व मंे बेगम से देवी सिंह को हटाने की माग की लेकिन बेगम ने इस और कोई ध्यान नहीं दिया। 1838 ई0 में बेगम सुमल की मृत्यु हो गई और उसकी जांगीर को ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने राज्य में मिला लिया। रेगाल सिविल सर्विस के अधिकारी इलियाट और प्लांउडन को बंदोबस्त का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने जाटों को संतुष्ट करने का प्रयास किया। लेकिन हापुड तहसील और बुलंदशहर जिले की अपेक्षा, जहां गैर जाट काश्तकार ज्यादा थे, लगान की दूर ऊँची ही रखी। किसानों ने इसका विरोध किया। अंग्रेज अधिकारियों ने जबरदस्ती वसूली करनी शुरू की। इससे छोटे-बडे़ सभी किसानों में रोष फैल गया। 1840 और 1850 ई0 के दशकों में बागपत और बड़ौत के इलाकों में भारी तनाव उत्पन्न हो गया। भूमि रिकार्डो को देखने से बंदोबस्त द्वारा उत्पन्न प्रक्रिया के कारण पुराने जमींदारों और काश्तकारों की जमीन उनके हाथ से निकल गई। बिजरौल में भी जमीन निलामी की गई। फांसू नामक यूरोपियन ने जो बेगम समरू के दरबार में भी रहा था हरचन्दपुर गांव खरीद लिया। शाहमल इससे बहुत रूष्ट हुए उस समय देश खाप के चौधरी शरद राय थे। शाहमल की योग्यता से प्रभावित होकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण अधिकार चौधरी शाहमल को सौंप दिए थे।
    शाहमल में संगठन करने की अद्भूत शक्ति थी और तत्कालीन स्थितियों में उसने पूरा लाभ उठाया। उसके पास लगभग 6 हजार सैनिक ऐसे थे कि हर समय उसके कहने पर लड़ने मरने के लिए तैयार रहते थे। उन सैनिकों में ऐसे भी बहुत से सैनिक थे जो ब्रिटिश फौज के भगौडे थे।
    शाहमल ने अपनी योग्यता, बुद्धिमता, सांगठनिक शक्ति के बल पर अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के लिए जैहाद छेड़ दिया था। उनके साथ के क्रांतिकारियों में हिलबाड़ी के पंडित रूढे़राम, धीरा काहर, फिरोजपुर का अचल सिंह गूजर, हवा का सूरत सिंह, बडका का अल्ला दिया व अनेकांे रवा राजपूत और दूसरी जातियों के लोग थे जो उनके नेतृत्व में अंग्रेजी राज के विरूद्ध संघर्षरत थे। 10 मई 1857 को मेरठ में सैनिकों ने अंग्रेजों के विरूद्ध बिगुल बजा दिया, जिसे सैनिक क्रांति का नाम दिया गया। इस घटनाचक्र का समाचार सर्वत्र आग की तरह फैल गया। मेरठ के विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों की हत्या की और लूटपात कर दें 11 मई 1857 को प्रातः दिल्ली में मुगल बहादुर शाह जफर के सम्मुख उपस्थित हुए। शाहमल ने सर्वप्रथम 12 व 13 मई को अपने साथियों के साथ फिरंगी परस्त बंजारे व्यापारियों के दल पर आक्रमण किया और उन्हें लूट लिया। राम में ही उन्होंने बड़ौत की पुलिस चौकी पर चढाई कर दी। चौकी पर कोई अंग्रेज अधिकारी मौजूद नहीं था। वहां उपस्थित सिपाही भाग खडे हुए। अगले दिन उन्होंने बड़ौत तहसील पर आक्रमण किया। जैसे ही क्रांतिकारियों ने तहसील में प्रवेश किया अंग्रेज तहसीलदार चुपके से निकल गया, लेकिन उसके मेम वहीं रह गई। लूटपाट और तोड़-फोड़ के बाद शाहमल गैंग को अपने साथ किशनपुर बरास के रास्ते से बिजरौल ले गए। खलिहानों ने गेंहू की फसल चल रही थी। मेम को बैल हांकने पर लगा दिया गया। तपती धूंप ने बेलों के पीछे चलते हुए मैन बेहोश होकर गिर पड़ी। यह तमाशा देखने के लिए आस पास के सारे ग्राम वासी इकट्ठे हो गए। होश में आने पर शाहमल ने मेम से कहा कि आपसे हमारी कोई रंजिश नहीं है, आपकों यह दिखाना था कि हम और हमारी औरते कितनी मेहन से अनाज पैदा करते हैं और तुम्हारे साहब लोग हमसे सारा ही छिनना चाहते है। आप हमारा कष्टपूर्ण जीवन महसूस करो और देखों कि हम कहां गलत है। रमाला के एक व्यक्ति ने तहसील में छिपे अंग्र्रेजों को यह खबर वी पर तहसीलदार 3 मील दूर बिजरौल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मैम से कोई अभद्रता नहीं की गई और अगले दिन मेम को वापस बडौत भेज दिया गया।
    जीन्द (पंजाब) के अंग्रेज परस्त राजा स्वरूप सिंह की फौजे मेरठ तथा हापुड की छावनियों में आती-जाती रहती थी और ये बागपत में पडाव डालती रहती थी। इलाके के किसान स्वरूप सिंह को जाट सिक्ख तथा उसकी फौजों को अतिथि मानकर उनके लिए रसद तथा घास का प्रबन्ध करते थे। किसानों ने अंग्रेजों के विरूद्ध जींद नरेश से सहायता मांगी। स्वरूप सिंह ने कोई उत्तर नहीं दिया तो शाहमल ने बागपत की सराय व बाजार जहां सेनाएं ठहरती थी, लूट लिया और अंग्रेजों को मार भगाया। रात में ही उन्होंने यमुना नदी पर नांव का पुल जो पंजाब को जोड़ने का एकमात्र रास्ता था तोड़ दिया।
    शाहमल साधारण किसान था परन्तु उसमे असाधारण सूझबूझ थी। दिल्ली के क्रांतिकारियों को मदद करके उसने अपना प्रमाद बढ़ा लिया था वह उन्हें खाने  पीने के सामान की आपूर्ति करता था। दिल्ली में क्रांतिकारियों के नेताओं ने उसकी उपयोगिता और क्रांति के प्रति समर्पण भावना देखकर उसको सूबेदार बना दिया। शाहमल ने बिलौचपुरा गांव के एक बलूची नदीबख्श के पुत्र अल्ला दिया को अपना बूत नियुक्त करके दिल्ली भेजा ताकि अंग्रेजों के विरूद्ध लडने के लिए मदद व सैनिक मिल सकंे। बागपत के थानेदार वजीर खां ने भी इसी उद्देश्य से सम्राट बहादुरशाह जफर को अर्जी भेजी। बागपत के नूरखा के पुत्र महताब खां से भी उनका सम्पर्क था। इन व्यक्तियों का दिल्ली सम्पर्क था। सभी ने शाहमल को बादशाह के समक्ष पेश किया और कहा कि वह (शाहमल) क्रांतिकारियों के लिए बहुत सहायक हो सकता है ऐसा ही हुआ। शाहमल ने न केवल अंग्रेजों के संचार साधनों को ठप कर दिया बल्कि इस क्षेत्र को दिल्ली के लिए आपुर्ति क्षेत्र में बदल दिया।
    बसौद गांव में शाहमल ने दिल्ली के क्रांतिकारियों के लिए 8 हजार मन गेंहू व दाल का भण्डार एकत्रित कर रहा था। शाहमल इस गांव में ठहरे हुए थे, परन्तु ब्रिटिश सेना के पहुंचते ही वे बचकर निकल गये। ब्रिटिश सैनिकों में गांव वालों को बाहर आने के लिए मजबूर कर दिया। परन्तु दिल्ली दिल्ली से आए दो गाजी एक मस्जिद में मोर्चा लगाकर लड़ते रहे और अंग्रेजों की योजना सफल न हो सकी। शाहमल ने यमुना नहर पर स्थित सिंचाई विभाग के अधिकारी के बंगले को अपना कार्यालय बनाया हुआ था। उसने अपनी सक्षम सेना व गुप्तचर सेना भी कायम कर रखी थी, जो उसे समय पर गुप्त सुचनाए देती थी। एक बार ब्रिटिश सैनिकों ने क्रांतिकारियों पर आक्रमण किया, शाहमल को इसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी। उन्होंने सैनिकों के मुकाबले के लिए हजारों क्रांतिकारियों को भेजा, जिससे ब्रिटिश सैनिकों की दशा खराब हो गई। क्रांतिकारी वीर शाहमल को सभी जातियों ने भरपूर सहयोग दिया। उनके नेतृत्व में लड़ी जा रही क्रांतिकारी गतिविधियों में विभिन्न जातियों के नेताओं ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। अहैडा के गूजरों ने बड़ौत और बागपत की लूट तथा दिल्ली मेरठ सड़क बन्द करने में हिस्सा लिया। सिसरौली के जाटों ने शाहमल के सहयोगी सूरजमल की मदद की। मुनगर जिले के शामली, जौला और सोरग के जाटों ने अन्य क्रांतिकारियों से मिलकर अंग्रेजों से बुढ़ाना का किला छीन लिया और शामली तथा थाना भवन तहसीलों पर कब्जा कर लिया। बुलंदशहर के मशहूर क्रांतिकारी वतीदादखां को भी सहायता भेजी गई।
    विलियम स्पेट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा (शाहमल) जाट ने जो बड़ौत परगना का गवर्नर हो गया था और जिसने राजा की पदवी धारण कर ली थी, उसने और अन्य तीन बार परगनों पर नियंत्रण कर लिया। दिल्ली के घेरे के समय वहां की जनता और दिल्ली मैरिसन इसी व्यक्ति के कारण जीवित रह सकी।
    स्थिति बिगडते देखकर जून के अंत में मेरठ के मजिस्ट्रेट डनलप की सलाह पर जनरल हेबिट ने स्वयं सेवक घुड़सवारों की एक टूकड़ी भर्ती की जिसमें अधिकतर बेरोजगार युरोपियन युवक थे। इन्हें सबसे बढि़या किस्म की एनफील्ड रायफलें मुहैया कराई गई था किसानों से राजस्व इकट्ठा कराने में सहायता करने में इनाम देने की बात भी कही गई। ये मटमैले कपडे पहनते थे, इसलिए इसे खाकी रिसाला पुकारा गया। इसके अलावा ठेके पर कुछ सिक्ख घुडसवार भी भती किए गए जिन्होंने विद्रोह को दबाने के लिए स्वैच्छा से अपनी सेवाएं अर्पित की। इनकी मदद से मेरठ के भीतरी इलाकों से राजस्व इकट्ठा करने और कानून व्यवस्था बहाल करने का कार्य शुरू किया। बाबा शाहमल जिन्होंने स्वयं को अर्द्धस्वतंत्र घोषित कर रखा था अंग्रेजों के खिलाफ छापामार युद्ध कर रहे थे। बागपत, बड़ौत, सरधना आदि तहसीलों में अंग्रेजों का शासन समाप्त सा ही था। प्रतिकार स्वरूप डनलप ने 16 जुलाई को एक मजबूत घुडसवार टुकड़ी लेकर मेरठ से प्रस्थान किया और हिण्डन नदी पर स्थित धौलाना पहुंचा जहा कुछ धनी साहुकार अंग्रेजों का समर्थन कर रहे थे। वहां उसे सूचना मिली कि शाहमल डीला गांव पर हमला करने वाला है, इसका कारण था कि जब शाहमल ने बड़ौत तहसील पर हमला किया वहां के तहसीलदार रोहतक निवासी कर्मअली ने नवल सिंह राजपूत की सहायता से खजाने को हटाकर डीला गांव में पहुंचा दिया था। इसलिए आश्चर्य नहीं था कि शाहमल जो तीन मील उत्तर में स्थित गांव बसीद में डेरा डाले हुए थे, डीला पर आक्रमण न करे। डनलप में उन्हें बसौद में ही घेरने की योजना बनाई लेकिन बसौद पहुंचने पर उसे पता चला कि शाहमल रात के अंधेरे में बसौद से निकले गये। वहां डनलप को लगभग 6 हजार मन अनाज, दालें तथा खाद सामग्री हाथ लगी जो दिल्ली के स्वतंत्रता सैनानियों के पास भेजी जाने के लिए तैयार थी। गौरों ने इस सामग्री को नष्ट कर दिया। बासौद मुस्लिम त्यागियों को गांव था पर शाहमल का साथ देने का मूल्य चुकाना पड़ा। गांव में पकडे गये सभी 180 व्यस्क पुरूषों को गोली से उडा दिया गया।
    जुलाई 1857 को क्रांतिकारी नेता शाहमल को पकड़ने के लिए ब्रिटिश सेना संकल्पबद्ध हुई। एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा है कि ऐसा लगता था कि सारा देश हमारे विरूद्ध खड़ा हुआ है। लोगों को इकट्ठा करने के लिए चारों और ढोल बजाए जा रहे थे और भीड़ एकत्र होकर आगे बढ़ रही थी। शाहमल के भतीजे भगत ने हमले से बाल बाल बचकर ब्रिटिश सेना को बड़ौत तक खदेड़ा। इस समय शाहमल के साथ-2 हजार शक्तिशाली सैनिक थे। शाहमल आमने सामने की अपेक्षा गुरिल्ला प्रणाली से युद्ध करने के विशेषज्ञ थे। हथियारों और प्रशिक्षित सेनाओं की कमी के कारण प्रत्यक्ष युद्ध लड़ने की उनकी क्षमता नहीं थी। बड़ौत के दक्षिण भाग में खाकी रिसाला और शाहमल के अनुयायियों ने घमासान संघर्ष हुआ। मुठभेड आमने सामने की थी।’’
    21 जुलाई 1857 को किसान सैनिक निर्भिकता के साथ लड़ रहे थे। युद्ध को क्रीडांगन समझने वाले किसान अंग्रेजों की प्रशिक्षित और हथियारों से लैस सेना के समक्ष मृत्यु का आलिंगन कर डटे रहे। शाहमल स्वयं भयंकर मारकाट मचा रहे थे। परन्तु स्थिति का चक अब उनके पक्ष में नही था। वे बुरी तरह घायल हो चुके थे। रूधिर की धारा बह रही थी। खाकी रिसाले ने जान की बाजी लगाकर आक्रमण किया। जिसमें शाहमल वीरगति को प्राप्त हुए।
    उन्हें मारने वाले व्यक्ति ने युद्ध का वर्णन इस प्रकार किया हमने दो घुडसवारों को जो भालों से लैस थे तेजी से भागते हुए देखा, मैंने अपना घोडा आगे बढ़ाया औ दो मिनट में उनसे आग हो गया, मेरे निकट के घुडसवार जिसके शाहमल होने की मैं कल्पना भी नही कर सकता था कि तलवार मेरे निकट गिर गई, परन्तु उसका भाला अब भी उसका पास था। उसकी पगड़ी का किनारा अब भी जमीन पर लटक रहा था। दूसरे सैनिक ने शाहमल पर दो गोलियां दाग दी। मेरा ख्याल था कि अब वह कभी नही उठ सकेगा, किन्तु वह खडा हुआ और उसने मुझ पर प्रहार किया, जिससे मुझे दो चोटे आयी, दूसरी चोट घातक हो सकती थीं, परन्तु मैंने ताकत लगाकर उसका भाला अपने शरीर से खींच निकाला। इसी क्षण सवार अफजल बेग आ गया। बेग ने उस पर भाले से प्रहार किया, इससे वह गिर गया और बेग को गालियां देने लगा। पारकर ने उसे पहचान लिया, उसके आदेश पर शाहमल का शरीर टूकडे टूकडे कर दिया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। क्रांतिवीर शाहमल की मृत्यु के सन्दर्भ मंे कई अन्य विवरण भी उपलब्ध है जिनमें एक अब विवरण मंे स्वाधीनता सैनानी आचार्य दीपांकर ने अपनी पुस्तक स्वाधीनता आन्दोलन और मेरठ में लिखता है- कि करम अली जो मुसलमान राजपूत रांघड था ने गुहाना के जंगल में जहाँ चिकनी मिट्टी होने के कारण शाहमल को छोडी दलदल में फंस गयी थी, पीछे से हमला कर उन्हें मार गिराया गया। इसके अलावा मेरठ गजेटियर में जो विवरण उपलब्ध है कि बड़ौत में डनलप ने मौर्चा संभाला। भयानक संघर्ष हुआ। शाहमल आने सामने से लड़ा भीषण संघर्ष से सल्तनत के लिए लड़ते हुए शहीद हो गये।
    शाहमल की शहादत ब्रिटिश अधिकारियों के लिए बड़ी विजय थी। उनकी नींद हराम करने वाला क्रांतिवीर शाहमल अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए युद्ध भूमि में शहीद हो गया। शाहमल की शहादत समय की शिला पर उकेरी गई एक ऐसी घटना है जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता है, यह देशभक्ति और आजादी की मशाल का जीता जागता स्मारक है।
    बागपत का खण्डवारी क्षेत्र, बागपत की टंकी वाला तालाब, बागपत में गांव के पुल वाला यमुना तट, बड़ौत की पुरानी तहसील डौला और बसौद तथा बिजरौल आदि ऐसे अनेक स्थल है जो शाहमल के क्रिया कलापों से जुड़े है। इन्हें चिन्हित कर ऐतिहासिक महत्व दिया जाना अपेक्षित है। इनसे ही यथार्थ रूप में शाहमल के मूल्य का अंकन हो सकेगा। यद्यपि नवम्बर 1857 तक अंग्रेजों ने क्रांति की क्रूरतापूर्वक कुथल दिया परन्तु यह निर्विवाद है कि समाज के हर वर्ग में चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का रहा हो क्रांति में सक्रिय भाग लिया। स्वतंत्रता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किसानों द्वारा किया गया यह संघर्ष अद्वितीय था, यह एक महान संघर्ष था और इसने भारत से ब्रिटिश साम्राज्य की इतिश्री करने में योगदान दिया। उनका विशेषकर मेरठ/बागपत में शाहमल का क्रांति में योगदान अविस्मरणीय है।
    देवेन्द्र कुमार आर्य
    एडवोकेट
    आर्य भवन, नई बस्ती
    बागपत (उ0 प्र0)


भोले हिन्दू तू कब जागेगा
    रामफल सिंह आर्य
    महामंत्री आर्य प्रति0 सभा हि0 प्र0।
भ्रमण में मेरी रूचि बाल्यकाल से ही है तथा मेरे भ्रमण का केन्द्र ऐतिहासिक स्थान अधिक सहते हैं। प्राचीन दुर्ग, प्रसाद, संग्रहालय आदि देखने में मुझे विशेष प्रसन्नता होती है। उन स्थानों तक सम्भवतः मैंने कोई स्थान ऐसा नहीं छोड़ा है कि जहां पर मैं गया और वहां स्थित किसी ऐतिहासिक स्थल को न देखा। इसे एक संयोग ही समझिये कि मार्च,2016 में घर पर कई आवश्यक कार्य होने के कारण पूरे मार्च का अवकाश ले लिया और कार्य समाप्ति पर जा समय शेष बचा उसका उपयोग खजुराहों, ग्वालियर, आगरा तथा मथुरा तथा मथुरा, फतेहपुर सीकरी सिकन्दरा आदि स्थानों पर जाने के साथ-2 मुम्बई भी गया जहां पर एक सप्ताह लगाया। मुझे विश्वास है कि आप सभी लोग इन स्थानों के इतिहास से कुछ न कुछ तो परिचित ही होंगे। इन स्थानों पर जाकर जो कुछ मुझे अनुभव हुआ और जो प्रायः सर्वत्र दृष्टिगोचर हुआ वह आप सब की जानकारी के लिए लेखबद्ध करना उचित का किसी वस्तु को देखने का पृथक-2 ढंग है। कोई किसी का दृष्टिकोण से देखता है, कोई किसी दूसरे से।
    दुर्गो, राज प्रसादों आदि को देखते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि राज्य सत्ता एवं राजनीति का केन्द्र होने के कारण से स्थान समय-समय पर युद्धों का शिकार होते रहे अतः इनका भग्नावस्था में होना एक सामान्य सी बात है। देशीय राजाओं के परस्पर के आक्रमणों के अतिरिक्त विदेशी आक्रान्ताओं ने इनकी दशा अधिक बिगड़ी है। परन्तु में जो बात अपने इस भ्रमण में हुए अनुभव के आधार पर कहना चाहता हूं वह यह है कि कई प्राचीन मन्दिरों मंें भी हम गये और संग्रहालयों में रखी गई प्राचीन मूर्तियों को भी देखा परन्तु इनमें से एक भी मूर्ति हमें ऐसी नहीं दिखाी कि जो टूटी हुई न हो। दूसरी विशेष बात यह देखी कि प्रायः सभी संग्रहालयों में जो मूर्तियां उपलब्ध है वे अधिकतर महात्मा बुद्ध या महावीर जैन के समय की है। कुछ इससे प्राचीन भी है लेकिन इनके काल की बहुतायत से है। महात्मा बुद्ध अथवा गुप्तकाल की जो मूर्तियां है वे महर्षि दयानन्द जी महाराज के उस वाक्य  की प्रबल पुष्टि धरती दिखाई देती है जो उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में मूर्ति पूजा विषय पर लिखते समय अंकित किया कि ‘‘मूर्ति पूजा कहां से चलो? उत्तर देते हुए पुनः लिखते हैं कि जैनियों से। जैनियो ने कहां से चलाई? अपनी मूर्खता से।’’ यदि आज आप ध्यानपूर्वक प्राचीन मन्दिरों और संग्रहालयों को देखेंगे तो महर्षि जी का यह वाक्य आपको शत् प्रतिशत सत्य दिखाई देगा। यह भी सत्य है कि मूर्ति कला भारत थे लिखे कोई नवीन नहीं है। परन्तु इन्हें ईश्वर मानकर इनकी पूजा करने का मूर्खतापूर्ण कार्य तो जैन एवं कुछ काल ये प्रचलित हुआ। यह काल भारत का विचारे ही प्रथाओं को आश्रय देना प्रारंभ कर दिया था। हमारी इस बात से आप उस समय और भी अधिक सहमत हो जायेंगे जब आप प्राचीन इतिहास का (इस युग के इतिहास का विशेषतः अवलोकन करेंगे)। आर्थावर्त देश में से राज्य व्यवस्था के बिगड़ने से, अविद्या का प्रचार होने से, आपसी फूट और कलह के कारण से यही वह काल है जब विदेशों से आक्रमणकारी आने प्रारंभ  हो गये थे। इस देश के लोगों के पास यद्यपि अपार धन, बल, सैन्य शक्ति आदि या तथापि आलस्य एवं  पतनकारी नीतियों तथा राजाओं की अदूरदर्शिता के कारण प्रायः प्रत्येक आक्रमण कारी अपने उद्देश्य में सफल रहा और यहां की धन सम्पदा को लूट-लूट कर अपने देश को ले गया।
    यहां सबसे काले पृष्ठों को रचने वाले, इस पावन देश की धरा को रक्त रंजित करने वाले तो मुगल आक्रान्ता में जिन्होंने न केवल धन सम्पदा लूटी अपितु यहां की अमूल्य धरोहरों, मन्दिरों, दुर्गो आदि को भूमिसात करने के साथ साथ आग और तलवार का वह नग्न नृत्य किया जिसका उदाहरण पूरे विश्व में वहीं देखने को नहीं मिलता।
    पूरे देश में एक भी नगर ऐसा शेष न रहा जहां पर मन्दिरों को तोड़ा न गया और मूर्तियों को नष्ट न किया गया हो। क्योंकि ये आक्रान्ता कुरआन की आयतों के आधार पर काफिरों (हिन्दुओं) को लूटना, मारना, बन्दी बनाना, उनकी स्त्रियां को ‘लौण्डियों’ बना कर अपने साथ ले जाना अपना धर्म या ‘खुदा का पैगाम’ समझते थे। सुप्रसिद्ध इतिहासकार मान्य श्री पी, एन ओक अपने ग्रंथों में ठीक लिखते हैं कि मुगलों, मुसलमानों ने अन्याय की सारी सीमायें पार कर डाली। मन्दिरों को ध्वस्त करके उन्हें मस्जिदों में बदल डाला, दुर्गो पर अधिपत्य जया कर यह प्रसिद्ध कर दिया कि यह तो हमारे अमुक सुलमान या बादशाह ने बनवाया था, सारे प्राचीन साहित्य को, इतिहास को नष्ट किया। उस समय उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प रखे कि या तो इस्लाम स्वीकार करो या मरने के लिए तैयार रहो। आज हमें आश्चर्य इस बात पर होता है कि भारत में जो मुसलमान इस समय हैं (जो पाकिस्तान में भी बंटवारे के समय चले गये थे उन समेत) वे यही के मूल निवासी थे पर विषयुक्त शिक्षा के कारण यहीं के अपने भाईयों के शत्रु बन कर उन्हें मारना अपना धर्म समझते थे और समझते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि एक ही पिता के दो पुत्र अपना, मूल, अपना इतिहास भुला कर परस्पर शत्रु बन बैठे। उस आक्रमण काल में मुगलों ने जो मन्दिरों एवं मूर्तियों का विनाश किया उसकी कुछ झलक आपको हम आचार्य देव प्रकाश जी, मौलवी अरबी, काबिज की पुस्तक, ‘‘मन्दिरों’’ को लूट, हिन्दुओं की बरबादी’’ के आधार पर दिखला रहे है। प्रिय पाठकगण। ध्यानपूर्वक पढि़ये और जानिये कि मुगलों का अत्याचार किस सीमा तक था। इससे पूर्व कि अपने इस विषय में हम आगे बढ़े आपको बताना उचित समझते है कि आचार्य देव प्रकाश का जन्म पंजाब के जि0 गुरदास पुर में एक मुस्लिम परिवार में हुआ परन्तु आप स्वामी दर्शनानन्द जी महाराज के तर्को से बहुत प्रभावित हुए और धीरे-धीरे आपका आर्य समाज से सम्पर्क होता गया। आर्य समाज से विशेष सम्पर्क अमृतसर में हुआ और अन्ततः मुस्लिम मत को छोड़ कर आप वैदिक धर्म के प्रचार में लग गये। कई शास्त्रार्थ भी किये। सर्वप्रथम मूर्तिपूजा पर इनका शास्त्रार्थ श्रद्धाराम फिल्लौरी से हुआ जिसमें ये विजयी रहे। वैदिक धर्म प्रचार का बड़ा कार्य किया। आप अपनी उपरोक्त पुस्तक के पृष्ठ 29पर लिखते है कि-
    ‘‘हजरत मुहम्म्द साहिब मूर्ति पूजा को ही अपने प्रचार का माध्यम बना कर उठे। पहले तो व्याख्यानों द्वारा ही मूर्ति पूजा की खण्डन करते थे। फिर जब मुहम्मद साहब ने अपने हाथ से बुतों को तोड़ा और जो बुत ऊंचाई पर ये उनको तोडने के लिये हजरत अली को अपने कंधों पर चढ़ाकर सवको तुड़वा दिया
    (मुकइमस तफसीरूफुकीन मिरजा हैरत देहलवी प्र0 374)
    जब मक्का के सब बुत टूट चुक तो हजरत मुहम्मद ने हजरत अली से योजना कराई कि अगले वर्ष न कोई मुश्रिक काबा में प्रविष्ट हो सकेगा और न कोइ नंगा होकर हज कर सकेगा।
    (उक्त तफशीर पृ0 376)
    पाठकवृन्द आपने देखा कि यह कार्य पहले मक्का से प्रारंभ हुआ और वहां पर भी मूर्तियां थी। अब आगे चलते है।
    इस मन्दिर तोड़ने की बद रस्म को जिसे हजरत मुहम्मद ने आरंभ किया था, भारत पर किये गये पहले आक्रमण तक जारी रखा। सिन्ध के गवर्नर हुशाम बिन उमरू  ने कन्धार पर हमला किया। यह नगर जिला भड़ौच में है और कन्धार को जीतकर वहां के बुतखाने को शिराकर उसके स्थान पर मस्जिद बनाई।
(हिन्दुस्तान में अरबों की हुकुमतें पृ0 26 तथा फरतूहल्बुल्रान पृ0 200)
मुहम्मद बिना कासिम:
    सुलेमान नदबी महोदय ने अपनी पुस्तक अरबो हिन्द के तअल्लकात’’ के पृष्ठ 11 पर लिखते है कि- जब मुस्लिम हमले सिन्ध की सरहद पर हो रहे थे तो हिन्दुओं और बौद्धो में बड़ी खींच तान थी। बौद्धों ने अपने को कमजोर समझ कर मुसलमानों से सन्धि कर ली और बौद्धों ने इस सम्बन्ध में पुरी तरह से पालना की। जब मुहम्मद बिन कासिम बैरून में आया तो बौद्धों ने उसका स्वागत किया। रसदका पूरा प्रबन्ध कर दिया। इस घर की लड़ाई ने सिन्ध का राज्य मुसलमानों के हवाले कर दिया। कासिम ने जो झाडा बुतखाने पर लगा था उसको नीचे गिरा दिया। इस झण्डे के गिरने का दाहर की सेना पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। लड़ाई छोड़ छोड़ कर वे भाग गये जो युद्ध के याुग्य पुरूष थे उनकां कतल कर दिया गया, बुतखाने के भिक्षुक और पुजारी को कत्ल कर दिया। यह कम तीन दिन तक जारी रहा। कासिम ने वहां पर मस्जिद बनाई।
    (फतहल्बुल्रान उर्दू पृ 186-187)
    श्री0 पी0 एन0 ओक ने भी अपनी पुस्तक ‘मुस्लिम सुल्तान’ मंे भाग 1 पृ 6 पर लिखा है कि इस 17 वर्षीय मु0 बिन0 कासिम ने सिंध में अत्याचार की आधी चला दो, एक लाख हिन्दु स्त्रियों को केन्द्र कर लिया गया और मन्दिरों की मस्जिदें बना दी।’’
    आगे फिर पृ0 12 पर लिखा है कि काफिरों (हिन्दुओं) को या तो मुसलमान बना लिया गया कत्ल कर दिया गया। देवमूर्तियों को चूर-3 करके मन्दिरों की बजाये मस्जिदें आदि बना दी गई। सन् 812 ई0 को भाढवा नदी के तट पर कासिम शहर मंे प्रविष्ट हुआ छह हजार हिन्दु कत्ल किये और मन्दिरों को मस्जिदें बना दिया। (वही पृ0 12)
    राजधानी बालौर पर हमला:-
    शहर के बाहर एक बड़ा सुन्दर उपवन था उसमें एक बड़ा सुन्दर मन्दिर था। कासिम उसे तोड़ कर विनाश कर दिया। (वही पृ0 25)
    जब मुहम्मद बिन कासिम ने मुलतान को विजय कर लिया तो एक ब्राह्मण कासिम के पास आया और कहा कि मैं आपको एक ऐसे खजाने का पता बताता हूं जिसका किसी को पता नहीं। पुराने जमाने में जसोवन नाम का एक राजा था जो दिन रात मूर्ति पूजा करता था। उसके खजाने में बेशुमा लम्बा (300) एक सौ गज चौडा हौज बनवाया। उसके आस पास वृक्ष लगाये। हौज के बीच में एक पचास लम्बा व पचास गज चौडा मन्दिर बनवाया उसमें एक विशेष बुत सोने का बना कर रखा। उसके नीचे चालीस डेगे (बड़ा बर्तन) तीन सौ तीस मन सोने के टुकड़ो से भर कर दबा दिया। मु0 बिन कासिम उस ब्राह्मण के पथ-प्रदर्शन से वहां पहुंच गया, सोने का बुत मौजूद जो दो सौ तीन मन भारी था। फिर डेगे निकलवाई उनमें से तेरह हजार दो सौ मन सोना निकला इस सोने को दमिश्क में पहुंचाया।
(आईनाए हकीकत नया बान पहला अकबर शाह नजीब पृ0 61-92)
    महमूद गजनवी:
    नगरकोट का बुतखाना:- महमूद इसे तोड़ने के लिये भला। जब वह किला भीम के पास पहुंचा और उसे घेरने का हुक्म दिया। उसके पास रहने वाले लोगों को कत्ल कर दिया गया। यह किला एक पहाड़ पर म0, हिन्द के  लोग इसे बुतों का खजाना कहते थे। सोना चान्दी और जवाहरात वहां इस कदर थे जो किसी बादशाह के खजाने मंे नही थे। जब महमूद वहां पहुंचा तो केवल सेवक और पुजारी ही वहां थे। महमूद को वहां से साठ लाख दीवार सुर्य, सात सौ मन चान्दी, सोने के बर्तन कई सौ मन सोना और 30 मन जवाहरात प्राप्त हुए जो उसने  वहां से लूटे।
    (तारीख फरिश्ता पृ0 40 और तारीख बहरूस्तान, नवल किशोर प्रेम मुफती गुलाम सरवर लाहौरी पृ0 253)
    फिर महमूद ने थानेसर के मन्दिर को तोड़ा वहां के बुत को गजनी मंे भेजा ताकि लोगों के पांव से उसको रौंदा जाये (वही पृ0 41)
    प्रिय पाठक गण! ये कुछ अत्यल्प उदाहरण हमने ज्यों के इसलिये दिये है कि आप इनको पढ़कर यह अनुमान लगा इसके कि इस्लाम के आकाओं ने यहां आकर क्या किया। इनकी गाथा इतनी इतनी लिखी है कि यदि लिखने लगें तो एक विशालकाय ग्रंथ का निर्मााण हो सकता है। यह एक ध्रुव सत्य है कि इन आक्रमणकारियों में मूर्ति, मूर्तिपूजकों तथा इस देश के राजाओं के प्रति हृदय में घृणा का एक ऐसा तूफान था जो किसी प्रकार से दबाये न दबता था।  एक के बाद एक मन्दिर को तोड़ना मूर्तियों को ध्वस्त करना उनके लिए एक आनन्द का विषय था और साथ ही उन्हें वहां से अपार धन तो मिलता ही था यह अलग से एक बोनस के रूप में था। देश द्रोहियों की न उस समय कमी थी और न ही आज कमी है। ये द्यातक लालच के अभिभूत होकर ऐसा घृणित कृत्य किया करते थे जिसका फल मुस्लिम उन्हें भयानक मृत्यु के रूप से दिया करते थे। हमारे लोगों का पतन इस सीमा तक पहुंच गया था कि वे लोग पूर्व में घटित सभी क्रुरताओं को भूलकर फिर फिर विश्वासघात करते, फिर मरते, फिर उसी रास्ते पर और भी आगे बढ़ते। हाय रे हिन्दुओं! सत्य में जड़ की उपासना करते-2 तुम्हारा मन, मस्तिष्क, हृदय सब जड़ हो गया और संवेदना नाम की कोई वस्तु, स्वाभिमान नाम की कोई वस्तु देश प्रेम नाम की कोई वस्तु तुम्हारें भीतर शेष न रही। मुनिवर गुरूदत्त ठीक ही कहा करते थे कि यदि तुम किसी व्यक्ति के बारे में जानना चाहते हो तो उस भगवान के बारे में जानों कि जिसकी वह पुजा करता है।’’ जड पुजकों कर यह उक्ति कितनी सटीक बैठती है वह उस समय के इतिहास को देखकर स्पष्ट पता चल जाता है। समय-2 पर होने वाले आक्रमणों ने इस विशाल राष्ट्र की कमर तोड़ कर रख दी। ऐसा नहीं है कि यहां के राजाओं ने बस एकदम समर्पण कर दिया। युद्ध एवं विरोध का एक संघर्ष तो हुआ परन्तु संगठित रूप से नहीं हुआ। जब एक राजा पर आक्रमण होता था तो दूसरा यह सोचकर चुप रहता था कि यह मुझ पर नहीं है उल्टा अपना कोई व्यक्तिगत द्वेष होने के कारण यह सोचता होगा कि चलो अच्छा है मेरे शत्रु को कोई अन्य दण्ड दे रहा है। अन्यथा स्वदेशी राजा यदि पूर्ण संगठित होकर आक्रमण का प्रत्युत्तर देते तो किसी मजाल भी कि कोई आंख उठाकर भी देख सकता।
    इन आक्रमणकारियों ने केवल मन्दिर को लूटा हो मूर्तियों को तोड़ा हो ऐसा नहीं है, तलवार के बल पर लोगों को मजहब कर उन्हंे मुसलमान भी बनाया, जैसा कि हम ऊपर पहले भी लिख चुके हैं। प्राचीन साहित्य, इतिहास कला कौशल, ज्ञान, विज्ञान, कला एवं संस्कृति का भी विनाश उतने ही वेग से किया जिसका परिणाम आगे आने वाले लम्बे समय तक हमें भुगतना पड़ेगा। यह कितना भयानक विचार था कि हमारे अपने भाई, इसी देश के निवासी कालान्तर में अपने आप को भिन्न मान कर अपने ही भाईयों का मजहब के नाम पर गला काटने लग गये और इस विशाल राष्ट्र के टुकड़े हो गये। इतना ही नहीं उन्हें फिर भी शांति न मिली अपितु आज फिर वहीं द्यातक विष पुनः इस राष्ट्र की शिराओं मंे फैल रहा है।
    अपने आप को हिन्दु कहलाने वालों। आपके लिए भविष्य ने अपने गर्भ में क्या छुपा कर रखा हैं, इसका अनुमान तो नहीं है परन्तु लक्षणों को देखकर लगता है कि एक भयानक समय आपकी प्रतीक्षा में अपनी विनाशकारी दाड़े लेकर खड़ा है।
    वर्तमान की जे0 एन0 यू0 की घटना उसकी साक्षी दे रही है।  हम लोग प्रायः उस खतरे से  अनभिज्ञ अभी केवल धन, मकान, पुत्र, पुत्री आदि में अपने कर्तव्य की इतिश्री मानकर निश्चिंत से हो रहे हैं परन्तु आपके खून-पसीने से कसाई भाई ये धन सम्पत्ति भला कब तक सुरक्षित रह पायेगी इस ओर हमारा ध्यान नहीं है।
    आईये! संक्षेप में हम कुछ और भी उदाहरण देखें जो कि मान्य आचार्य देव प्रकाश जी ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में दिये है।
    ज्वाला देवी के मन्दिर का विनाश एवं लूट (महमूद गजनवी सन् 366 हिजरी)।
    सन् 400 हिजारी में कन्नौज का विनाश एवं सन्तोख का विनाश। उसके उपरान्त मथुरा में बे रोक टोक पहले शहर का विनाश फिर मन्दिरों को लूटा। अपार सम्पदा हाथ लगी। गजनी को लिखे पत्रानुसार उस समय इस शहर में एक हजार प्रसाद थे जो नभ मण्डल को चूमते थे। सोना, चान्दी, जवाहरात की भरमार थी। सब लूट कर ले गया, लाखों हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया। मन्दिरों के स्थान पर मस्जिदें बनाई गई।
    फतेहपुरी के पास गये चन्देल का दुर्ग था उसका विनाश नागरिकों का वद्य, मन्दिरों के स्थान पर मस्जिदों का निर्माण।
    पाटन के राजा परमदेव की हार, दुर्ग से मिले धन से 3000 उट, हजारांे घोडे और हाथियों पर खजाना लादा गया।
    सोमनाथ के मन्दिर की लूट यह अति प्रसिद्ध है ही। यहां पर मन्दिर के घडियाल की जंजीर ही दो सौ मन सोने की थी। अन्य सामान का अनुमान पाठक स्वयं लगा लें।
    तैमूरलंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया और उसके विषय में मिस्टर आर्नल्ड लिखते है- तैमूर ने तौजके तैमूूरी में लिखता है कि मुझे दिल्ली में आये पन्द्रह दिन हो गये। यह समय मैंने बड़े आनन्द और प्रसन्नता में व्यतीत किया, राजशाही जश्न किये और लोगों को भोज दिये। इसके बाद मैंने सोचा कि मैं हिन्दुस्तान में काफिरों से लड़वे आया था और यह मुहिम ऐसी सफल हुई कि जहां कंही में पहुंचा वहां विजय को प्राप्त हुआ और कई लाख काफिरों को मौत के घाट उतारा और दीन की तलवार को इस्लाम के शत्रुओं के खून से रंगा। अब इतनी विजय प्राप्त करने के पश्चात् मैंने विचार किया कि अब अधिक आराम करना ठीक नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान के पथभ्रष्ट लोगों से लड़ने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। तैमूर ने दीन की तलवार का बहुत वर्णन किया है कि काफिरों का विनाश किया, खुदा का नाम लेकर बुतों को तोड़ा ब्राह्मणों का कत्ल किया, मन्दिरों को गिराया और मन्दिरों के स्थानों पर मस्जिदें बनाई।
    इसी तैमूर द्वारा अयोध्या के चौदह हजार, बनारस के तीस हजार बुतपरस्तों का कत्ल।
    ईश्वर में गंगा दर्शन के त्यौहार पर हिन्दुओं का कत्ल आया।
    पानीपत और दिल्ली में तैमूर द्वारा अमानवीय अत्याचार, लूट।
    शाहजहां द्वारा भी लाहौर के पास के मन्दिरों का विनाश।
    जहांगीर द्वारा राजा मानसिंह की नगरी में मन्दिरों का विनाश पुरोहितों की सामूहिक हत्या, गऊओ का वध, लूट।
    आलमगीर द्वारा खण्डीला, सांब मीला के आस पास के मन्दिरों का विनाश लूट।
    औरंगजेब द्वारा बनारस, अहमदाबाद, उदयपुर, चितौड, जयपुर आदि में राक वर्ष के अन्दर 252 मन्दिर तोड़े अनेक स्थानों पर मन्दिरों के स्थान पर मस्जिदें बनवाई।
    हुमायूं और शेरशाह द्वारा बनारस को रौंदा गया, मन्दिरों का विनाश। स्त्री और बच्चों को पकड़ना, दुराचार आदि।
    महमूद खिलजी द्वारा चित्तौड़ का विनाश। एक लाख हिन्दुओं का कत्ल पुराना पुस्तकालय भस्म।
    बखत्यार खिलजी द्वारा विहार का विनाश। प्रसिद्ध नालन्दा का जलाना एवं लूटा नालन्दा के पास स्थित रेलवे स्टेशन आज भी बख्तियारपुर है।
    कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा मेरठ एवं दिल्ली का विनाश, मन्दिरों का विनाश, लूट।
    शहाबुद्दीन ऐबक द्वारा चार लाख काफिरों के जनेऊ तोड़कर उनका मत परिवर्तन। एक हजार बुतों को तोड़ा।
    इसी के द्वारा बनारस, कन्नौज और कन्नजर में एक हजार मन्दिरों का विनाश, मस्जिदों का निर्माण।
    मुहम्मद गौरी द्वारा मन्दिरों का विनाश लूट।
    इल्तमश द्वारा उज्जैन का विनाश। झेलसा का भी विनाश, लूट।
    मुहम्मद शाह द्वारा अनेक बुतखानों की लूट।
    सुलतान तुगलक, आदिल शाह द्वारा दूर-दूर तक इस्लामीकरण, मन्दिरों का विनाश, लूट।
    अजमेर में राजा इन्द्र सेन के मन्दिर को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण।
    सुलतान कुली कुतुबशाह द्वारा गोलकुष्ण पर अधिकार किला पांगल मच्छली पत्तन, राजमुन्डी, राज कुन्डाह, करनायी के मन्दिरों का विनाश।
    हाजी रूप द्वारा बीजापुर के मन्दिरों का विनाश
    टीपू सुल्तान द्वारा कृष्णा राव के मन्दिर का विनाश यह देवन से थोड़ी दूरी पर था।
    मुजाहिदशाह द्वारा श्री रंग मन्दिर का विनाश लूटा।
    अहमदशाह बहमती द्वारा गुलवर्गा तथा वीजानगर में औरतों, बच्चों का क्रुरता से कत्ल, गायों की कुरबानी, मन्दिरों का विनाश।
    आदिलशाह द्वारा धारवाड़, बनकापुर एवं बीजानगर का विनाश
    सुल्तान सिकन्दर (670 हिजरी) द्वारा मन्दरायल के मन्दिरों का विनाश
    फिरोजशाह ने नगरकोट सब बुत तोडें और गायों के मांस को तोबरों में भर-भर कर ब्राह्मणों की गर्दनोें में बांधा और छावनी में घुमाया। मन्दिर बनाने वालों को जिन्दा जलाया। इसने झेलसा के आस पास के बुतों को तोड़कर लम्बे तक हिन्दुओं के खून से उन्हें नहलाया।
    जलालुद्दीन ने मालवा के मन्दिरांे का विनाश किया।
    कश्मीर में रैचन की मृत्यु के पश्चात उसके सेनापति द्वारा भीषण रक्तपात, मजहब परिवर्तन, लूट, अत्याचार।
    सैफूद्दीन द्वारा भारी संख्या मंे हिन्दुओं को मुसलमान बनाकर, भयानक अत्याचार।
    सिकन्दर लोदी द्वारा मन्दरैल, अवन्तगढ़ में विनाश लीला।
    आह! इस वर्णन के उपरान्त हम क्या कहें और क्या न काहें, समझ में नहीं आता। यह तो उस लूट का उस अत्याचार का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन है तो शासकों ने की। उनके गुण्डों द्वारा अन्य मुसलमानों द्वारा जो कुछ किया गया वह तो खण्डहरों में दफन है। यह विनाश क्यों हुआ, मूल कारण क्या था, यदि विचारे तो पता चलता है कि मूल कारण या बुतपरस्ती अर्थात् मूर्तिपूजा, जडपूजा। न मूर्तिपूजा होती न मन्दिरों में इतना धन लगता न लूटा जाता। महर्षि दयानन्द जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश में सोलह दोष इस मूर्ति पूजा के लिखे है। महर्षि के जीवन चरित्र लेखक माननीय श्री वह देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी ने जो भूमिका जीवन, चरित्र की लिखी है वह पढ़ने योग्य है। इस मूर्ति पूजा ने भारत का विनाश कर डाला। पाषाण की पूजा से मस्तिष्क भी पाषाण के हो गये। समस्त अज्ञान पाखण्ड अनाचार की जड़ यह मूर्तिपूजा हीहै। यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि हमने अपने इतिहास से कुछ नहीं सीखा और पुनः उसी मार्ग पर चल पड़े। न जाने यह हिन्दू कब जागेगा।
    भाईयों! झूठी आशा के पुल, कल्पनालोक का विचरण, झूठे बाबाओं, तान्त्रिकांे, ज्योतिषियों, पण्डे, पुरोहितों, जादू टोने के जाल से बाहर निकल कर स्वयं को जानों पहचानों। ईश्वर ने तुम्हें तो कुछ देना था वह तो तुम्हारें जन्म के समय दे दिया अब यदि कुछ और चाहिये तो पुरूषार्थ करो। बुद्धि, तर्क एवं युक्तिपूर्वक चलना सीखों अन्यथा समाप्त हो जाओगे। यदि आपको कोई बचा सकता है तो स्मरण रखिये केवल और केवल महर्षि दयानन्द की विचारधारा बचा सकती है। कहीं ऐसा न हो कि आपके जागने से पहले बहुत ढेर हो जाये इसलिए तुरन्त जागो। यह संसार बड़ा विचित्र है यहां सब कुछ अच्छा नहीं है। ध्यान से देखो, जांचो, परखों फिर आगे बढ़ों नहीं तो धोखा खाओगे।



लेखक
रामफल सिंह आर्य

सौजन्य सेः
शांति धर्मी मासिक पत्रिका
यह अमूल्य मानव शरीर हमें परमपिता परमेश्वर की अपार कृपा से प्राप्त हुआ है। इसका सदुपयोग करने के लिए हमें ईश्वर की आज्ञा के अनुरूप ही जीवन यापन करना चाहिए। सांसारिक कत्र्तव्यों को पूरा करते हुए हमें जीवन के आध्यात्मिक पक्ष को उपेक्षित न करना चाहिए। जीवन में ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल आचरण करने से न केवल हमारा जीवन ही सुख, शांति और सफलता से व्यतीत हो सकता है, अपितु मृत्यु के उपरांत हम मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी भी बन सकते हैं। मनुष्य जीवन का उद्ïदेश्य पशुओं की तरह केवल खाना, पीना, सो जाना अथवा संतान पैदा करना ही नहीं है। शारीरिक और सामाजिक उन्नति के साथ-साथ आत्मा के स्तर को ऊ ँचा उठाना है कि मनुष्य पक्षपात रहित न्याय अर्थात धर्माचरण करता हुआ सांसारिक भौतिक वस्तुओं को साधन मात्र समझे। मनुष्य जीवन का उद्ïदेश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष जीवन का चरम लक्ष्य है। यदि मनुष्य जीवन पाकर भी मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न न किया जाए, तो जीवन व्यर्थ है। मोक्ष शब्द मुच् धातु से बना है, जिसका अर्थ है छूटना। किससे छूटना? दुखों से। यह जन्म-मरण रूप दारुण दु:ख ऐसा विचित्र दु:ख है कि मनुष्य अविद्या के कारण इसी को सुख आनंद समझता है। संसार के जितने भी भोग्य पदार्थ हैं, वे सब दु:ख मिश्रित हैं। धन सम्पत्ति, वैभव, पुत्र परिवार आदि सुख के साधन हैं, तो दुख के माध्यम भी हैं। संयोग के साथ वियोग है। सम्पन्नता के साथ विपन्नता भी है, परंतु अविद्या के कारण मनुष्य इन्ही भोगों की प्राप्ति के प्रयत्नों में अपना जीवन खपा देता है, पर उसकी तृष्णा कभी शांत नहीं होती।
आनंद स्वरूप परमेश्वर के आनंद के समक्ष ये भौतिक सुख-सुविधाएं कोई महत्त्व नहीं रखती। परमेश्वर के आनंद अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिए चित्त की वृत्तियों को मोड़ देने की आवश्यकता पड़ती है। चित्त हमारे अंत:करण का एक भाग है, जिस पर हमारे जन्म-जन्मांतर के विचारों, कर्मों के संस्कार हैं। इनके कारण वह चंचलतापूर्वक उन-उन प्रवृत्तियों की ओर हमें अग्रसर करता है। ये चित्त की वृत्तियां बड़ी विचित्र हैं। इनको ऋषियों ने दो वर्गों में बांटा है- क्लिष्ट और अक्लिष्ट। क्लिष्ट अर्थात क्लेशों, दु:खों की ओर ले जाने वाली। अक्लिष्ट अर्थात् दु:खों से छुटकारा दिलाने वाली। इन दोनों प्रकार की वृत्तियों को निरुद्ध करने का नाम योग है। 'योगश्चित्त वृत्तिनिरोध:Ó। महर्षि पतञ्जलि ने योग के आठ अंग बताए हैं, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से प्रथम दो अंग तो साधक की उच्च नैतिक स्थिति से संबंध रखते हैं। यम और नियम क्या हैं? ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग की अनिवार्य योग्यताएं हैं, जिनका पालन किए बिना साधक की ईश्वर प्राप्ति की ओर गति नहीं हो सकती। यम पांच हैं- तत्राहिंंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा: यमा:।। अहिंसा- अर्थात् किसी के प्रति मन में भी वैर भाव न रखना। सत्य- जो वस्तु जैसी है, उसके प्रति वैसा ही दृष्टिकोण रखना। अस्तेय- स्वामी की आज्ञा के बिना किसी वस्तु का उपयोग न करना। ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्मप्राप्ति, विद्याप्राप्ति और वीर्यरक्षा। अपरिग्रह अर्थात अपनी आवश्यकता से अधिक संचय न करना। शौच- अंदर और बाहर की शुद्धि, संतोष अर्थात् पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात् ईश्वर कृपा से जो कुछ प्राप्त हो, उसमें संतुष्ट रहना, तप अर्थात- सुख-दु:ख, हानि लाभ, प्रतिकूल-अनुकूल परिस्थितियों में समान अवस्था में रहने का प्रयत्न करना। स्वाध्याय अर्थात् वेद-शास्त्रों और ऋषि मुनियों के बनाए हुए, आत्मा को ऊंचा उठाने वाले उत्तम ग्रंथों का अध्ययन करना, अपनी आंतरिक व व्यावहारिक स्थिति के बारे में चिंतन करते रहना। ईश्वर-प्रणिधान अर्थात् ईश्वर के प्रति समर्पण भाव। संसार में जितने भी भोग्य पदार्थ हैं, प्राप्त हुए हैं, वे सब परमेश्वर की अपार कृपा से ही प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार की भावना रखते हुए सदा ईश्वर के प्रति धन्यवादी होना। ये यम और नियम मनुष्य के जीवन को सफल और सुखमय बनाते हैं और योग प्राप्ति का अधिकारी भी बनाते हैं। इनका यथावत् पालन करने से ही व्यक्ति योग के शेष अंगों की सिद्धि कर सकता है।
मनुष्य के सामने दो स्थितियां हैं- एक तो सांसारिक सुख, सुविधाओं, विषय-वासनाओं और कुप्रवृत्तियों का मार्ग है, जो देखने में अच्छा है, किंतु इसका परिणाम अत्यंत दुखदायी होता है। इसे प्रेय मार्ग कहते हैं। दूसरा मार्ग योग और मोक्ष का मार्ग है, जो कण्टकाकीर्ण और ऊबड़-खाबड़ दिखाई देता है, परंतु इसका परिणाम परमेश्वर के साक्षात्कार द्वारा मोक्ष के आनंद को प्राप्त करना है- इसे श्रेय मार्ग कहते हैं। श्रेय मार्ग ही परम-पुरुषार्थ है।

अब प्रश्र उठता है कि क्या सांसारिक सुख-सुविधा जुटाने और उनका उपयोग करने में पाप है? इसका समाधान भी वेद भगवान प्रस्तुत करते हैं- ''तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:ÓÓ (यजु.) अर्थात समस्या उपभोग की नहीं, समस्या आसक्ति की है। जब हम परमेश्वर की कृपा से प्राप्त साधनों का मालिक स्वयं को समझने लगते हैं, तो हमारी प्रवृत्तियां बिगड़ती हैं, इसलिए परमेश्वर का आदेश है कि तुम भोग तो करो पर त्याग भाव से भोग करो। एक तो यह समझें कि यह शरीर या भोग सदा रहने वाला नहीं है, दूसरे यह परमेश्वर ने अपनी अपार कृपा से हमें प्रदान किया है। इस प्रकार की भावना बनने पर इसके दुरुपयोग का प्रश्र ही उत्पन्न नहीं होता।


सहदेव समर्पित 
सम्पादक शांति धर्मी मासिक पत्रिका 

पिछले दिनों हरियाणा मंे एक छोटी सी परन्तु बड़े ऐतिहासिक महत्त्व की घटना हुई। सरकार ने गुड़गाँव का नाम बदल कर गुरु ग्राम कर दिया। भाषा के दृष्टिकोण से गुड़गांव अशुद्ध है, अपभ्रंश है। निश्चय ही सरकार का उद्देश्य इसके ऐतिहासिक महत्त्व को उजागर करना भी रहा होगा। इस पर दो प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिलीं। आधुनिक पढ़े लिखे युवाओं की प्रतिक्रिया थी- नाम बदलने से क्या रोजगार मिल जाएगा? नाम बदलने से क्या होता है? दूसरी प्रतिक्रिया यह थी- टेलीविजन पर एक परिचर्चा के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर कह रही थीं- ठीक है, यह (महाभारत का इतिहास) एक साहित्य है, हम भी इसे पढ़ते हैं साहित्य के रूप में- यह कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है।
आधुनिक शिक्षा पद्धति से शिक्षित इतिहासकार इस पक्ष के हैं कि भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास एक मिथक मात्र है। रामायण और महाभारत को मिथक मानना इसी प्रवंचना का एक हिस्सा है। वाल्मीकीय रामायण भारतीय परम्परा में एक आर्ष ग्रंथ है, जिसे आप्त वचन के रूप में प्रमाण माना जाता है। यद्यपि इसमें समय समय पर अनेक प्रक्षेप हुए हैं, तथापि यह भारतीय इतिहास का एक प्रमुख स्रोत है। इसको मिथक कहना पाश्चात्य, यहूदी ईसाई पक्षपाती इतिहासकारों के लिए आवश्यक था। क्योंकि उन्हें अपनी यह बात मनवानी थी कि भारतवर्ष और इसकी संस्कृति उतनी प्राचीन नहीं है जितना भारत के लोग मानते हैं। और उन्हें इस तथ्य को भी दबाना था कि भारतवर्ष विद्या का आदि स्रोत है। पिछली दो पीढि़यों के आधुनिक शिक्षा पद्धति से शिक्षित इतिहासकारों ने वही सब पढ़ा है जो इन्हें आजादी के बाद पढ़ाया गया है। पश्चिमी लोगों ने भारत के लोगों को हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखने के लिए जो षड्यंत्र रचा था, वह भारत के कम्युनिष्ट विचारधारा के लोगों के अनुकूल था, क्योंकि उनके संस्थापक ने कहा था कि ‘भारतवर्ष का अपना कोई इतिहास नहीं है।’ इस झूठ को प्रमाणित करने के लिए उन्हें पाश्चात्यों का पका पकाया माल मिल गया। ‘शत्रु का शत्रु मित्र होता है।’ इस नीति के अनुसार उन्होंने उन सब बातों को स्वीकार कर लिया जो भारतीय संस्कृति के मूल पर कुठाराघात करती थीं। यदि ये पक्षपात रहित होते और इन्हें विदेशियों की बात ही ज्यादा अच्छी लगती होती तो ये फ्रैंच विद्वान् लुई जैकेल्यो की बात भी मानते जिन्होंने वर्षों भारत में रहकर यहाँ की संस्कृति ओैर इतिहास का अध्ययन किया और इस भूमि को विश्व सभ्यता का पालना लिखा। (बाईबिल इन इण्डिया)
आश्चर्य तो इस बात का है कि 150-200 वर्ष पहले तक रामायण, महाभारत व इसके इतिहास को किसी ने काल्पनिक नहीं माना। राम का काल त्रेता और द्वापर की सन्धि में था। वर्तमान में अट्ठाईसवीं चतुर्युगी का कलयुग चल रहा है। यदि राम को इसी 28 वें त्रेता और द्वापर की सन्धि में हुआ माना जाए तो राम को कम से कम 864000 (आठ लाख चैंसठ हजार वर्ष) होते हैं। किन्तु यह तो दुर्जनतोष न्याय है। भारतीय इतिहास के अनुसार रामायण का काल करोड़ों वर्ष पूर्व का है। वायु पुराण 70/48 ‘त्रेतायुगे चतुर्विंशे--’ के अनुसार राम चैबीसवें त्रेतायुग में हुए हैं। इस प्रकार राम को एक करोड़, इक्यासी लाख, पचास हजार वर्ष ;1,81,50000 हो चुके हैं।

हमारे देश में, और इस देश से सैंकड़ों/सहस्रों वर्ष पूर्व जाकर दूसरे देशों में रहने वाले इस देश के लोगों के बीच में राम का जन्मदिन रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। इसी मास में हनुमान जयन्ती भी मनाई। क्या कभी किसी काल्पनिक उपन्यास के पात्रों का जन्मदिन भी मनाया जाता है। क्या कभी किसी ने शरत् के ‘देवदास’ प्रेमचन्द्र की ‘निर्मला’ या जंगल बुक के ‘मोगली’ या ‘हैरी पाॅटर’ का जन्मदिन भी मनाया है?
ऐतिहासिक प्रमाणों के संदर्भ में इस प्रकार के इतिहासकारों को स्वामी दयानन्द ने मुंह तोड़ उत्तर दिया है। आर्यों के इस देश पर आक्रमण के झूठ के संदर्भ में वे लिखते हैं- किसी संस्कृत ग्रंथ में नहीं लिखा-- पुनः विदेशियों की बात कैसे माननीय हो सकती है।’ भारतीय इतिहास के अपने संदर्भ हैं और वे कुछ हद तक अब भी सुरक्षित हैं। गैर भारतीय संदर्भों से भारतीय इतिहास को समझने का प्रयास करना ऐसा ही है जैसे साईकिल पर बैठकर चांद पर पहुंचने का प्रयास करना। जब आर्यावत्र्त इतिहास बना रहा था, तब तक तो उनको लिखना भी नहीं आता था, और उन्होंने एक स्थान पर घर बनाकर रहना भी नहीं सीखा था।
ये पूर्वाग्रही इतिहासकार इतिहास की ‘वैज्ञानिक दृष्टि’  का बड़ा नाम लेते हैं, उस पर विचार कर लिया जाए कि वह वैज्ञानिक दृष्टि क्या है? भारतीय साहित्य में प्राप्त सहस्रों उल्लेखों को मिथक मानने वाले पाश्चात्य और माक्र्सवादी विचार के लोग स्वयं ही अवैज्ञानिक और दुराग्रही सिद्ध होते हैं। उनकी दृष्टि विदेशी लेखकों के लिखे गए 5-10 ग्रंथों से बाहर नहीं जा पाती। पक्षपात दोष से भरे हुए उन विदेशी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को विकृत करने के लिए जो षड्यंत्र और प्रयत्न किए उनसे नई पीढ़ी के अधिकांश भारतीय अपरिचित ही हैं। 19 वीं शताब्दी के लगभग मध्य में (2 फरवरी 1835 को) लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद् में भारत को गुलाम बनाने में आने वाली बाद्दाओं का उल्लेख करते हुए कहा था - ‘हम भारतीयों को तब तक गुलाम बनाने में समर्थ नहीं हो सकते जब तक हम उस देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रीढ़ तोड़ न दें। इसलिए मैं प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा हटाने का सुझाव देता हूँ। जब भारतीय सोचने लगेंगे कि विदेशी सामान और अंग्रेजी भाषा उनसे श्रेष्ठ है, तब वह देश अपना आत्मसम्मान और संस्कृति खो देगा और वह वैसा बन जाएगा जैसा अद्दीनस्थ देश हमें चाहिए।’
यहूदी वस्तुतः प्राचीन आर्यों के वंशज थे। जब उनमें अविद्या फैली तो वे अपना मूल भूल गए। वे अपने आप को सर्वश्रेष्ठ जाति मानते थे। वे लोग मानने लगे थे कि ईसा से 4004 वर्ष पूर्व आदम का जन्म हुआ था। इसके लिए लाटपादरी अशर ने संसार के इतिहास का तिथिक्रम निश्चित किया था। जब उन्होंने भारतीय इतिहास की प्राचीनता के बारे में सुना तो तो उन्हें लगा कि बाईबिल की मीनार गिर पडेगी। ¼Freder Bodmer The loom of Lan guage, NewYork-1944, p-174)
आक्सफोर्ड में कर्नल बोडन द्वारा संस्कृत के लिए चेयर स्थापित की गई। इसमें कर्नल ने बहुत धन दान किया। इसने 1811 ई0 में अपने वसीयतनामे में लिखा कि उसका इस चेयर के लिए इतना अधिक धन खर्च करने का उद्देश्य यह था कि ईसाई धर्मग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद किया जाए जिससे भारतीयों को ईसाई बनाने के कार्य में अंग्रेज आगे बढ़ें। (संस्कृत अंग्रेजी कोष- By Sir Monier Williams, Preface-1899) इस चेयर से संबंधित जिन इतिहासकारों को आज पाश्चात्य रंग में रंगे भारतीय इतिहासकार वैज्ञानिक दृष्टि वाले मानते हैं वे सब ईसाई मत के पक्षपाती थे और उनका एकमात्र उद्देश्य पारसी यहूदियों के साथ साथ भारतीय इतिहास और संस्कृति को विकृत करना था। विल्सन ने ‘हिन्दुओं की धार्मिक और दार्शनिक पद्धति’ पुस्तक में अपने अल्प ज्ञान के आधार पर भारतीय मान्यताओं का मजाक उड़ाया था। इसी प्रकार रोथ ने संवत् 1903 में वैदिक साहित्य और वेद का इतिहास नामक झूठा जाल ग्रंथ लिखा था। जान मूर का ग्रंथ  The Oriental Studies उसके प्रकाशकों के अनुसार ईसाई पादरियों के लिए अत्यंत उपयोगी था।
मैक्समूलर मैकाले से प्रभावित और कृतज्ञ था। यह वही व्यक्ति है जिसने ईसाई पक्षपात के कारण वेदों को गडरियों के गीत कहा था। हालांकि बाद में स्वामी दयानन्द के प्रभाव से निरुत्तर होने के कारण इसको अपने कथन में परिवर्तन करना पड़ा था, पर इसके ईसाई पक्षपात में कोई कमी नहीं आई थी। फ्रांस के विद्वान् लुई जैकोल्यो ने संवत् 1926 में एक ग्रंथ लिखा La Bible Dans L' inde ‘भारत में बाईबिल’ जैकोल्यो ने इस ग्रंथ में (डाॅ0 भवानीलाल भारतीय द्वारा संपादित इसका संक्षिप्त संस्करण घूड़मल ट्रस्ट हिण्डौन सिटी से प्राप्य है।) यह सिद्ध किया कि भारतवर्ष ही सब देशों की विद्या और संस्कृति का मूल है। जैकोल्यो ने भारतीय ब्राह्मणों के संपर्क में भारतीय इतिहास का गंभीर अध्ययन किया था। मैक्समूलर को यह सच्चाई सहन नहीं हुई। उसने कहा-‘जैकोल्यो अवश्य ही ब्राह्मणों के धोखे में आया है।’ मैक्समूलर के अनेक पत्रव्यवहार इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह हठी, पक्षपाती, विद्याशून्य और ईसाई मिशनरी था। 
वैबर भी इसी प्रकार का पक्षपाती स्काॅलर था। हम्बोल्ट ने गीता की प्रशंसा की। वैबर के लिए यह असह्य था। उसने गीता और महाभारत को बाईबिल के बाद का सिद्ध करने के लिए कहा- ‘गीता और महाभारत पर ईसाई सिद्धान्तों का प्रभाव है।’ (The History of SKT. Literature -1914 ) लोरिंशर और हाॅपकिन्स ने भी इसी कारण महाभारत को ईसा के बाद का सिद्ध करने के लिए घोर परिश्रम किया। बंगाल के लेखक बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय लिखते हैं- ‘भारत के लिए वह अशुभ घड़ी थी, जब वैबर ने संस्कृत का अध्ययन आरम्भ किया। जर्मन लेखक यह नहीं मान सकते थे कि ईसा के जन्म से सदियों पूर्व महाभारत रचा गया।’ (कृष्णचरित, तृतीय परिच्छेद)
यहूदी अध्यापक गोल्डस्टुकर ने वैबर और विहटलिंग के संस्कृत कोश में की गई अशुद्धियों की आलोचना की तो वैबर गालियों पर उतर आया। उसने लिखा कि ‘गोल्डस्टुकर का दिमाग पूरी तरह खराब हो गया है।’ गोल्डस्टुकर ने इस रहस्य को उजागर किया कि राथ, वैबर, बिहटलिंग, कूहन आदि लेखक कृतसंकल्प हैं कि भारत का प्राचीन गौरव नष्ट किया जाए। (पाणिनी का संस्कृत साहित्य में स्थान) मोनियर विलियम्स, रुडल्फ हर्नलि, विण्टरनिट्ज आदि संस्कृत के कथित विद्वान् न तो संस्कृत विद्या से परिचित थे और न पक्षपातशून्य। स्वामी दयानन्द तो कहते हैं कि वे लोग संस्कृत पत्रों का भी ठीक से अर्थ नहीं जान सकते हैं। उनके ग्रंथों के आधार पर संस्कृत साहित्य व इतिहास का अध्ययन करने वाले भारतीय यह कैसे जान सकते हैं कि इसके पीछे कितना बड़ा षड्यंत्र काम कर रहा था। स्वामी दयानन्द ने बूहलर, मोनियर विलियम्स, रुडल्फ हर्नलि और थीबो जैसे ‘विद्वानों’ के पूर्वाग्रह को पहचान लिया था। मद्रास विश्वविद्यालय के श्री नीलकण्ठ शास्त्री भी उनके षड्यंत्र को जान गए थे। भारत सरकार के लिपि विशेषज्ञ रहे सी0 आर0 कृष्णामाचार्लु ने भी इस षड्यंत्र का संकेत प्राप्त कर लिया था।
इस प्रकार के अल्प शिक्षित, पक्षपाती, दुराग्रही, वेदज्ञान शून्य ईसाई लेखकों के प्रभाव में आकर भारतवर्ष के सत्य इतिहास को मिथक या कल्पना कहने वाले मिथ्या अभिमानी लोग अपने आप को वैज्ञानिक दृष्टि वाला मानते हैं। भारत की आजादी के बाद भी यह ऐतिहासिक द्दोखाद्दड़ी निर्बाध जारी रही।
राष्ट्रवादियों के लिए यह गंभीर चिंतन का समय है। प्रश्न केवल राम या गुरुग्राम का नहीं है। यह प्रश्न भारतवर्ष के पूरे अस्तित्त्व का है। स्वामी दयानन्द ने वेदों के यथार्थ भाष्य पंजाब विवि में लागू करने का प्रयास किया, उसे सिरे नहीं चढ़ने दिया गया। इतिहासकार पं0 भगवद्दत्त ने पं0 नेहरू से इतिहास की धूर्तता की पोल खोलने के लिए पाश्चात्य प्रभाव से ग्रसित इतिहासकारों से खुली बहस करवाने की चुनौती दी, वह भी नहीं हो सका। आज यह स्थिति हो गई कि हमारे आदर्श पुरुष राम और कृष्ण भी काल्पनिक हो गए। संस्कृत के अध्ययन का निरन्तर हतोत्साहन इसी का हिस्सा है। यही कारण है कि आज की पीढ़ी कहती है कि नाम बदलने से क्या रोटी मिल जायेगी? स्वामी दयानन्द ने कहा था- कर्महीन तो हुए, नामहीन भी क्यों होते हो? भारत के लिए उसके अतीत का प्रश्न उसके भविष्य का प्रश्न भी है।


आधार
पं0 भगवद्दत्त: भारतवर्ष का बृहद् इतिहास
वैदिक वाङ्मय का इतिहास।
पण्डित लेखराम: सृष्टि का इतिहास
स्वामी दयानन्द: सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
पं0 रघुनन्दन शर्मा: वैदिक सम्पत्ति
स्वामी जगदीश्वरानन्द: वाल्मीकीय रामायण


सौजन्य से 
सहदेव समर्पित (9416253826)

अयोध्या दर्शन 



Ayodhya With little over 10 sq Km in area, lying on the banks of the river Ghagra or Saryu, this ancient city is believed to be the birth place of Lord Rama, the seventh incarnation of Lord Vishnu. The holy book of Hindus- the Ramayana- says, the city was founded by Manu. Later, it became the capital of the descendants of the Surya dynasty. Lord Rama was the most celebrated King of this dynasty. Known as ‘Kosaldesa’ in ancient times, the place has been described as “a city built by gods and being as prosperous as paradise itself”, in the Atharvaveda. From the time immemorial, this place has been noted for the performance of various rituals and Yajnas, including ‘Asvamedha Yajna’. From the epic and puranic ages, Ayodhya rose to prominence again in the 6th century B.C,the times of Buddha. Situated just about 10 Km from the district headquarters of Faizabad, Ayodhya is a city of temples of several religions. Various faiths have grown and prospered simultaneously and that also in different periods of time in the history. Jain traditions, for example, consider that five Tirthankaras were born at Ayodhya including Rishabhadeva, the first Tirthankar. Don’t miss the remnants of Buddhism, Hinduism, Islam and Jainism, that can still be found in Ayodhya.

Ayodhya is preeminently a city of temples yet, all places of worship here, are not only of Hindu religion. At Ayodhya several religions have grown and prospered simultaneously and also at different periods of time in the past.

Places to visit

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THE FAMOUS HANUMAN GARHI TEMPLE
HANUMAN GARHI

This is the most famous Temple of Ayodhya. It is 2 KM Far from the the Railway Station. Situated in the center of the town, this temple is approachable by a flight of 76 steps. Legend has it that Hanuman lived here in a cave and guarded the Janambhoomi or Ramkot. The main temple contains the statue of Maa Anjani, with Bal Hanuman seated on her lap. The faithful believe that all their wishes are granted with a visit to this holy shrine. Around this temple there is a huge amount of shopkeepers selling flowers and sweets.
A massive structure in the shape of a four sided fort with circular bastions at each corner houses a temple of Hanuman and is the most popular shrine in Ayodhya.



Kanak Bhawan
This has images of Sri Rama and Sita wearing gold crowns. It is also known as Sone-ke-Ghar.According to mythology in ancient time it a palace of gold. This palace was given to Sita by Kakai.




Ramkot


The chief place of worship in Ayodhya is the site of the ancient citadel of Ramkot which stands on an elevated ground in the western part of the city. Although visited by pilgrims throughout the year, this sacred place attracts devotees from all over India and abroad, on `Ram Navami’, the day of Lord’s birth, which is celebrated with great pomp and show, in the Hindu month of Chaitra (March-April).




Nageshwarnath Temple
The temple of Nageshwarnath is said to have been established by Kush the son of Rama. Legend has it that Kush lost his armlet, while bathing in the Saryu, which was picked up by a Nag-Kanya, who fell in love with him. As she was a devotee of Shiva, Kush erected this temple for her. It is said that this has been the only temple to have survived till the time of Vikramaditya, the rest of city had fallen into ruins and was covered by dense forests. It was by means of this temple that Vikramaditya was able to locate Ayodhya and the sites of different shrines here. The festival of Shivratri is celebrated here with great pomp and splendor.
Tulsi Udyan

Tulsi udyan is a beutiful garden created by the government. it is few far away from the Naya Ghat which is also created by government

Saryu River

Ayodhya Darshan starts only after the Saryu Snan
without saryu snan it is meant uncomplete.









Other places of interest
Rishabhadeo Jain Temple, Brahma Kund, Amawan Temple, Tulsi Chaura, Laxman Quila, Angad Tila, Shri Rama Janaki Birla Temple, Tulsi Smarak Bhawan, Ram ki Paidi, Kaleramji ka Mandir, Datuvan Kund, Janki Mahal, Gurudwara Brahma Kund Ji, Ram Katha Museum, Valmiki Ramayan Bhawan, are among other places of interest in Ayodhya.

Language : Hindi, Avadhi and English
Festivals : Shravan Jhoola Mela (July-August), Parikrama Mela (October-November), Ram Navmi (March-April), Rathyatra (June-July), Saryu Snan (October-November), Ram Vivah (November), Ramayan Mela.
Local Transport : Taxis/Tongas/Tempos/Buses/Cycle-Rikshaws.

RTI मलतब है सूचना का अधिकार - ये कानून हमारे देश में 2005 में लागू हुआ। जिसका उपयोग करके आप सरकार और
किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है। आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है।परंतु आज मैं आप को इस के बारे में कुछ और रोचक जानकारी देता हूँ -
RTI से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछकर सूचना ले सकते है।
RTI से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है।
RTI से आप दस्तावेज़ की प्रमाणित कापी ले सकते है।
RTI से आप सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना ले सकते है।
RTI से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते हैं।
RTI में कौन- कौन सी धारा हमारे काम की है।

धारा 6 (1) - RTI का आवेदन लिखने का धारा है।
धारा 6 (3) - अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है। तो वह विभाग
इस को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा।
धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता।
धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है
तो सूचना निशुल्क में दी जाएगी।
धारा 18 - अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उसकी शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए।
धारा 8 - इस के अनुसार वो सूचना RTI में नहीं दी जाएगी जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा हो या विभाग की आंतरिक जांच को प्रभावित करती हो।
धारा 19 (1) - अगर आप
की RTI का जवाब 30 दिन में नहीं आता है। तो इस
धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो।
धारा 19 (3) - अगर आपकी प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर दूसरी
अपील अधिकारी को अपील कर सकते हो।
RTIकैसे लिखे?
इसके लिए आप एक सादा पेपर लें और उसमे 1 इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप में अपने RTI लिख लें
..............................
.....
सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन।
सेवा में,
अधिकारी का पद / जनसूचना अधिकारी
विभाग का नाम.............
विषय - RTI Act 2005 के अंतर्गत .................. से संबधित सूचनाऐं।
अपने सवाल यहाँ लिखें।
1-..............................
2-...............................
3-..............................
4-..............................
मैं आवेदन फीस के रूप में 20रू का पोस्टल ऑर्डर ........ संख्या अलग से जमा कर रहा /रही हूं।
या
मैं बी.पी.एल. कार्डधारी हूं। इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल.कार्ड नं..............है।
यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से सम्बंधित
नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन सम्बंधित लोकसूचना अधिकारी को पांच दिनों के
समयावधि के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत
सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।
भवदीय
नाम:....................
पता:.....................
फोन नं:..................
हस्ताक्षर...................
ये सब लिखने के बाद अपने हस्ताक्षर कर दें।
अब मित्रो केंद्र से सूचना मांगने के लिए आप 20 रु देते है और एक पेपर की कॉपी मांगने के 2 रु देते है।
हर राज्य का RTI शुल्क अगल अलग है जिस का पता आप कर सकते हैं।
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 लेखक 
अज्ञात 
 
साभार 
प्रियांकु भटनागर
 
पतित पावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।
श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है।
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एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
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इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"
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गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम
इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही
किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?
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इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं पाया जा सका।
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सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियां सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे
मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो स्वभाविक है।
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वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी)
विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्शियम और
फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। वैज्ञानिक दृष्टि से हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है। इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।


हर हर गंगे



लेखक 
अज्ञात

साभार 
प्रियांकु भटनागर 
लेख भेजने के लिए
 मान लीजिये कि कोई ऐसा नीरस शुष्क एवं केवल भौतिकवादी बुद्धिजीची है कि जो न तो भगवान को मानता है और न ही कृतज्ञता को मानता है। यह संसार को केवल एक लेन-देन की मण्डी मानता है। यह मानता है कि बिना लिये दिये यहां का कार्य नहीं चलता। मात्र लेन-देन ही संसार का आधार है। ठीक है,  कोई कुछ भी मानने में स्वतंत्र है जिसका जैसा जी चाहे मानें। परन्तु विज्ञान को तो मानना ही पडेगा। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक दोनों ही इसे स्वीकार करते हैं। अपितु नास्तिक इसे अधिकार स्वीकार करता है। वह यह मानता है कि संसार परमाणुओं के मिलने से हुआ है। परमाणुणों के मिलन का नाम रचना है और बिखरन का नाम विनाश है। सब ग्रह उपग्रह परस्पर आकर्षण में बंधे हुए नियम से कार्य कर रहे है। ‘बिग बैंग’ से परमाणुओं में गति उत्पन्न हुई और उनके मेल से धीरे-2 पदार्थों का निर्माण होता चला गया। ठीक है! हम थोडी देर के लिए उनके इस विचार से सहमति रखते हैं। परन्तु विज्ञान को विज्ञान की ही दृष्टि से देखना चाहिए, मूर्खता की दृष्टि से नही। ऐसा नहीं है कि विज्ञान में सब कार्य चमत्कारी ढंग से पूर्ण होते हैं। स्मरण रखिये कि विज्ञान में एक क्रमबद्धता (वतकमत) होती है और सब कार्य एक निश्चित क्रम में एक नियम के अनुसर करते है। यदि रत्ती भर भी उस नियम का भंग होगा तो कार्य कभी सम्पन्न नहीं हो सकेगा। संसार के सभी भौतिकवादी इसे एक मत से स्वीकार करते हैं। विज्ञान कि जितने भी कार्य आपको दिखाई देते हैं वे सभी इसी नियमबद्धता पर आधारित हैं। अब विचार करना चाहिये कि क्या नियम कभी बिना नियामक के बन सकता है?  क्या नियम स्वयं बन जाते हैं? सड़क पर बाई ओर लोग अपने आप चलने लग गये या किसी ने ऐसा करने के लिए कहा? बाजार में अधिक वाहनों आदि के होने से भीड़ होने पर लाल बत्ती होने पर रूकने एवं हरी होनें पर चलने का नियम स्वयं बन गया था या किसी ने बनाया? नियम कभी भी बिना नियामक की यह विशेषता है कि वह कहीं भी, कुछ भी अपने नियमों को नहीं बदलता, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी कठिनाई का सामना क्यों न करना पडे। इसलिए यदि आप विज्ञानवादी हैं और यह  मानते हैं कि नियम बनाने वाला कोई नहीं तो इस बात को अपने मन से निकाल दीजिसे कि नियम स्वयं बनते हैं। अरे! जब सड़क पर चलने का साधारण सा नियम भी स्वयं नहीं बनता तो पदार्थों के निर्माण का महान कार्य क्या कभी बिना कर्ता के हो सकता है?
    दर्शन एवं विज्ञान दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। वैशेषिक दर्शन का ऋषि कहता है - ‘कारण अभावात् कार्य अभावः।’ अर्थात् कारण नहीं होगा तो कार्य नहीं होगा। यह एक सर्वतन्त्र सिद्धांत है। न्दपअमतेंस ज्तनजी है जो कहीं भी, कभी भी कुछ भी नहीं बदलती। जैसे पृथ्वी घुमती है इसे सब स्वीकार करते हैं। वैसे यह भी सिद्धांत है कि बिना कारण के कार्य नहीं होता। अब कारण कितने हैं? भारतीय वैज्ञानिकों, अपितु वैदिक विद्वानो ने इसे तीन भागों में विभक्त किया है। उपादान करण वह कि जिससे वस्तु बनती है जैसे कि घड़ा मिट्टी से मेज लकडी से और तलवार लोहे से बनती है। जब तक मिट्टी लकडी एवं लोहा नहीं होगा तब तक घडा मेज व तलवार नहीं बन सकते। दूसरा है साधारण कारण वह कि बनाने के साधन, घडा बनाने के लिये चाक, दण्ड, पानी एवं समय की मेज बनाने के लिए कुल्हाडी रन्दा, कीलें आदि की और तलवार बनाने के लिए भट्ठी, हथौड़ा, अग्नि आदि की आवश्यकता है। समय तो सामूहिक रूप से सबमें लगता ही है। अब मिट्टी है, चाक है, दण्ड है, पानी है और कुल्हाडी रन्दा, कीले, भट्ठी हथौडा अग्नि आदि सभी कुछ है, परन्तु बनाने वाला कुम्हार, बढ़ई और लौहार नहीं है तो क्या ये सब वस्तुऐं अपने आप बन जायेंगी? कदापि नहीं, यही तीसरा कारण कारण निमित्त कारण कहलाता है।  ये वे तीन परम आवश्यक साधन हैं जिनके बिना कभी कोई पदार्थ या रचना संभव ही नहीं है। अतः इस स्थिति में नास्तिक लोगों का यह कहना ठीक नहीं है कि संसार मात्र परमाणुओं के मेल से स्वयं बन गया।नहीं-2 उपादान कारण प्रकृति साधारण कारण-समय आदि और निमित्त कारण स्वयं ईश्वर के बिना सृष्टि रचना की कल्पना ही व्यर्थ है। यहां एक शंका यह हो सकती है कि जैसे कुम्हार को घड़ा बनाने के लिए चाक, दण्ड पानी आदि की आवश्यकता है तो क्या ईश्वर को भी इस प्रकार के बाहरी साधनों की आवश्यकता थी
 जी नहीं! ईश्वर का कार्य बाहरी रूप से पदार्थों का निर्माण करने का नहीं है। बाहरी साधनों की आवश्यकता अल्प शक्ति वालों एवं स्थूल शरीर वालों को रहती है। सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, एवं परम सूक्ष्म ईश्वर को नहीं। वह तो परमाणुओं के भीतर भी व्यापक है और बाहर भी अतः उसे कार्य करने के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता ही नहीं है। वह अन्दर से अपना कार्य करता है। स्मरण रखिये ईश्वर का कार्य घड़ा, मेज या तलवार बनाना नहीं है अपितु मिट्टो, लकड़ी या लोहा (वह भी सूक्ष्म अवस्था में) बनाना है जो मनुष्य नहीं बना सकता।
    अब यदि आर्प इैश्वर को नहीं मानते तो विज्ञान का सारा दुर्ग एक फूक में उड जायेगा। अतः यह कहना कि पराणुओं में गति आने से सब पदार्थों का निर्माण स्वतः ही हो गया मूखर्ता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। वेद मंत्र स्वयं कहा है- हिरण्यगर्भः समवर्तमाग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। संसार की उत्पत्ति से पूर्व प्रकृति भी थी और उसको गति देने वाला उसका स्वामी ईश्वर भी था। अतः यदि ईश्वर को न मानें तो यह महान् समस्या उत्पन्न हो जायेगी कि कोई भी पदार्थ बन नहीं सकेगा।
3    ज्ञान का अभाव: तीसरी महान् हानि होगी प्राणियों में और विशेष रूप से मनुष्यों में ज्ञान का अभाव होगा। ज्ञान दो प्रकार का है एक स्वाभाविक, दूसरा नैमितिक। स्वाभाविक ज्ञान जो पशुओं आदि है, इसमें कोई बहुत अधिक परिवर्धन नहीं किया जा सकता। हां! सामान्य रूप से उसका उपयोग हम अपने अनुसार करने योग्य उन्हें मोड़ लेते हैं परन्तु मनुष्यों का ज्ञान इससे भिन्न है। यह बढ़ाने से बढ़ जाता है और घटाने से घट जाता है। यदि सृष्टि के आरंभ में, ईश्वर मनुष्य को ज्ञान (वेद) न देता तो यह कभी भी ज्ञानवान नहीं बन सकता था। जो लोग (विशेष रूप से विकासवादी) यह कहते हैं कि मनुष्य में ज्ञान का उदय धीरे-2 हुआ, आरंभ में वह निरा जंगली ही था अपितु पशु ही था, वे बहुत बडी भूल में पडे हैं। उदाहरण के रूप में हमपने अपने शिक्षकों से, ुगुरूओं से शिक्षा पाई, उन्होंने अपने गुरूओं से और उन्होंने अपने गुरूओं से। यह क्रम पीछे की और चलते-2 एक ऐसी अवस्था में चला जाता है जहां पर शिक्षा देने वाला कोई भी गुरू नहीं बचता। उस समस्या का समाधान संसार का महानतम आस्तिक ऋषि, पंतजलि करता है। वह कहता है ‘ स पूर्वेषामापि गुरू कालेनानवच्छेदात् (योग 1/26) वह गुरूओं का भी गुरू है जिसको काल भी बाधित नहीं कर सकता। विकासवादी कहता है कि मनुष्य का विकास बन्दर से हुआ और धीरे-2 उसके ज्ञान में वृद्धि हुई। प्रथम तो इस विचार में ही अनेकों भ्रांतियां हैं फिर भी यदि यह मान लिया जाये कि मनुष्य का विकास बन्दरों से हुआ तो फिर ज्ञान का उदय होना, वह भी उतनी उच्च कोटि का यह नितांत असंभव है। बाहर की परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों नहो, उससे केवल इतना तो प्रभाव पड़ सकता है कि उससे प्राणियों का ब्राहृ रंग रूप कुछ बदल जाये या उनका खान पान बदल जाये परन्तु यह संभव नहीं है कि उनमें अमूल चूल परिवर्तन इस सीमा तक हो जाये कि जिससे उनकी समूची जाति ही बदल जाये और वह अपना विकास इस सीमा तक कर ले कि ज्ञान का उदय उसे धरा से गगन तक बढ़ा दे। बन्दरों का स्वभाव तो क्रूर, लड़ने झगड़ने एवं छीना झपटी का है। मनुष्य में यह संवेदना, एक दूसरे से सहायोग की भावना कहां से आ गई? ज्ञान भी ईश्वर प्रदत्त है। यदि ईश्वर को न मानें तो फिर आदि में ज्ञान का अभाव होने से मनुष्य अज्ञानी ही रहेगा।

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जब उत्तर भारत ख़िलजी, तुग़लक़, ग़ोरी, सैयद, बहमनी और लोदी वंश के विदेशी मुसलमानों के हाथों रौंदा जा रहा था तब भी दक्षिण भारत के "विजयनगर साम्राज्य" (1336-1665) ने 300 से अधिक वर्षों तक दक्षिण मे हिन्दू अधिपत्य कायम रखा ! इसी विजयनगर साम्राज्य के महाप्रतापी राजा थे "कृष्णदेव राय" ।

बाबरनामा, तुज़के बाबरी सहित फ़रिश्ता, फ़ारस के यात्री अब्दुर्रज्जाक ने "विजयनगर साम्राज्य" को भारत का सबसे वैभवशाली, शक्तिशाली और संपन्न राज्य बताया है, जहां हिन्दू-बौद्ध-जैन धर्मामलंबी बर्बर मुस्लिम आक्रान्ताओं से खुद को सुरक्षित पाते थे । जिनके दरबार के 'अष्ट दिग्गज' में से एक थे महाकवि "तेनालीराम", जिनकी तेलगू भाषा की कहानियों को हिन्दी-उर्दू मे रूपांतरित कर "अकबर-बीरबल" की झूठी कहानी बनाई गयी ।

इसी शक्तिशाली साम्राज्य मे एक "सेक्युलर राजा रामराय" का उदय हुआ, जिस "शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य" पर 300 साल तक विदेशी आक्रांता गिद्ध आंख उठा कर देखने की हिम्मत नही कर सके थे, उसे एक सेक्युलर सोच ने पल भर मे खंडहर मे तब्दील कर दिया ।

राजा कृष्णदेव राय की 1529 मे मृत्यु के 12 साल बाद "राम राय" विजयनगर" के राजा बने । रामराय पडले दर्जे के सेक्युलरवादी थे, सर्वधर्मसमभाव और हिन्दू-मुस्लिम एकता मे विश्वास रखने वाले रामराय ने दो गरीब अनाथ बेसहारा मुस्लिम भाइयों को गोद लिया । इन दोनो मुस्लिम भाइयों को न सिर्फ अपने बेटे का दर्जा दिया बल्कि उनके लिये महल प्रांगण मे ही मस्जिद बनबा कर दिया ।

ऐसे राजा रामराय के शासनकाल मे "विजयनगर साम्राज्य" की सैन्य शक्ति मे कोई कमी नही आई थी, कहा जाता है उनकी सेना मे 2 लाख सिपाही थे । अकेले विजयनगर से जीत पाने मे असमर्थ मुस्लिम आक्रान्ताओं ने 1567 में "जिहाद" का नारा देकर एक साथ आक्रमण किया ।

जिहाद के नारे के साथ 4 मुसलिम राज्यों ( अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और बीदर ) ने एक साथ विजयनगर पर हमला किया, इस युद्ध को राक्षस-टंग़ड़ी' या "तालीकोटा का युद्ध" कहा जाता है । 4 मुस्लिम राज्यों के सम्मिलित आक्रमण के बावजूद विजयनगर युद्ध जीत चुका था पर एन मौके पर राजा रामराय के गोद लिये दोनो लड़कों ने रामराय पर पीछे से वार कर दिया और कत्ल कर दिया ।

रामराय के गोद लिये बेटों के हाथों मारे जाते ही मुस्लिम सेनयों ने भयंकर मार-काट मचा दिया, लगातार 3 दिनों तक विजयनगर के स्त्री-पुरुष-बच्चे बेदर्दी से कत्ल किये गये, जिसकी सांख्या 1 लाख से ज्यादा बताई जाती है, विजयनगर को आग लगाकर नष्ट कर दिया गया । इस प्रकार एक सेक्युलर सोच ने समृद्ध-सक्षम हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया ! इसी महान साम्राज्य के खंडहरों पर खड़ा है आज का शहर "हम्पी", जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर विरासत के रूप मे दर्ज किया है ।

इतिहास गवाह है --अपने माता-पिता सहित पूर्वजों के माथे के कलंक ये सेक्युलर प्राणी जन्म ही कुल-खानदान, स्वधर्म, मातृभूमि का नाश करने के लिये लेते हैं
क्या ये सत्य है:-
राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार रोते-रोते अमेरिका पहुँच गये ! एक तो हमारे देश मे भिखारियों की बहुत बड़ी समस्या है ! देश का प्रधानमंत्री भी भिख मंग्गे की तरह ही बात करता है!

कटोरा लेकर राजीव गांधी पहुँच गये अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के पास! और कहने लगे हमे सुपर कम्पुटर दे दो ! इस देश के वैज्ञानिको ने बहुत समझाया था की मत जाइए बेइज्जती हो जाएगी लेकिन नहीं माने क्योंकि उनको धुन स्वार थी की हिंदुस्तान को 21 वीं सदी मे लेकर जाना है जैसे राजीव गांधी के चाहने पर ही देश 21 वीं सदी मे जाएगा अपने आप नहीं जाएगा ! तो रोनाल्ड रीगन ने कहा हमने सोचा है ना तो हम आपको सुपर कम्पुटर देंगे और न ही क्रायोजेनिक इंजन देंगे ! जबकि अमेरिका की कंपनी IBM के मन मे था की भारत सरकार से कुछ समझोता हो जाए और उसका सुपर कम्पुटर भारत मे बिक जाए ! लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने साफ माना कर दिया की ये संभव नहीं है ! ना तो बनाने के technology देंगे और ना ही बना बनाया सुपर कम्पुटर देंगे !! तो बेचारे मुह लटकाये राजीव गांधी भारत वापिस लौट आए और जो वाशिंगटन मे बेइज्जती हुई वो अलग !!
कांग्रेस वर्षों से देशवासियों को गलत तथ्यों से अवगत कराती आई है और देशवासी बिना किसी मौलिक जानकारी के अभाव में इसे सत्य मानते आए हैं। वैसे इसमें बहुत से लोगों को कोई गलती दिखती भी नहीं है क्योंकि कांग्रेस की देशवासियों को बेवकूफ बनाने की फितरत शुरू से रही है। एक ऐसा ही दावा कांग्रेस करती है देश में कम्प्यूटर को लाने का।
सारे कांग्रेसी यह डींगे मारते नहीं अघाते हैं कि देश में कम्प्यूटर लाने वाले राजीव गांधी थे। इस दावे को अक्षरश: सच मान कर तमाम कृतज्ञ देशवासी नतमस्तक भी होते रहते हैं और आगे भी होते रहेंगे। पर इस दावे में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है।
राजीव गांधी और कम्प्यूटर के बारे में दावा इतनी छाती ठोंक - ठोंक कर किया जाता है मानों राजीव गांधी न होते तो आज भी हम पोथी और स्लेट के युग में बैठ कर कलमें घिस रहे होते।
अब समय आ गया है कि हम इस दावें की असलियत जानें। कांग्रेसी ऐसे बोल बोलते हैं जैसे राजीव गांधी के 1984 में सत्ता संभालने के पहले भारत कम्प्यूटर नामक चिड़िया की ABC भी नहीं जानता था।
दावा ये किया जाता है राजीव गांधी ने देश को पहली बार कम्प्यूटर से परिचित कराया था। वास्तव में इसका श्रेय देश की कुछ उन निजी कम्पनियों को दिया जाना चाहिए, जिनकी कम्प्यूटर को भारत में लाने तथा उसे लोकप्रिय बनाने की जिजीविषा को कभी वह सम्मान नहीं मिला, जिसकी वे हकदार थीं।
देश में सबसे पहले स्वदेशी तकनीक से कम्प्यूटर को विकसित करने का श्रेय DCM Datasystems को दिया जाता है, जिसने 1972 में भारत में अपने कम्प्यूटर आधारित उत्पाद भारत में उतारे थे। इस कम्पनी ने अपने कदम बढ़ाते हुए तुरंत साफ्टवेयर के क्षेत्र में भी कदम रखे। याद रखिए कि यह राजीव गांधी के सत्ता संभालने के 12 वर्ष पहले की बात है।
हालांकि उससे 4 साल पहले यानि 1968 में स्थापित टाटा कन्सेलेटेन्सी सर्विसेज
(Tata Consultancy Services – TCS) देश में साफ्टवेयर विकसित करने का काम शुरू कर चुकी थी लेकिन उसका काम टाटा स्टील तथा यूटीआई व सैंट्रल बैंक जैसे कुछ प्रतिष्ठानों को पंच कार्ड और डेटा प्रोसेसिंग से सम्बन्धित टूल्स उपल्बध कराना था। बाद में TCS ने 1981 में अपना साफ्टवेयर डेवलपमेण्ट सेंटर पुणे में खोला।
वहीं शिव नदार की HCL 1976 में स्थापित हुई तथा उसने HP (Hewlett Packard) के साथ तालमेल कर भारत में कम्प्यूटर के उत्पादन का काम शुरू किया। भारत की दो दिग्गज आईटी कम्पनी इन्फोसिस (Infosys) और विप्रो (Wipro) 1981 में स्थापित हुई। Infosys का ध्यान जहाँ साफ्टवेयर पर अधिक था वहीं Wipro हार्डवेयर में अधिक रुचि दिखा रही थी। ये दिग्गज कम्पनियां आज भी अपने क्षेत्र में शानदार कार्य कर रही हैं। जहाँ तक भारत सरकार की आईटी के क्षेत्र में पहल की बात है तो उसने कम्प्यूटर मेन्टीनेंस कार्पोरेशन (CMC) नामक एक उपक्रम 1975 में स्थापित किया था तथा इसका मुख्य काम देश में तब स्थापित तमाम IBM कम्प्यूटर्स की मेन्टीनेंस करना था। बाद में इसे पहले अर्द्ध-सरकारी कम्पनी बना दिया गया तथा बाद में TCS को बेच दिया गया।
याद रखिए कि कम्प्यूटर के क्षेत्र में यह महत्वपूर्ण पहल राजीव गांधी के 1984 में पद पर बैठने से बहुत पहले कार्यान्वित हो चुकी थीं।
मूर्ख कांग्रेसी यह दावा भी करते हैं कि भारत में सरकारी दफ्तरों में कम्प्यूटर लगा कर उसे लोकप्रिय बनाने का काम राजीव गांधी ने किया। तो इस का सीधा सा उत्तर है कि वह समय था जब देश में कम्प्यूटर को लगाना अवश्यम्भावी था। आज दुनिया का पिछड़े से पिछड़े देश में सारा काम कम्प्यूटर के माध्यम से हो रहा है, तो क्या वहां भी राजीव गांधी जैसे किसी कम्प्यूटर भागीरथ ने पहाड़ों से लाकर देश में कम्प्यूटर प्रतिस्थापित किया था।
मुख्य तथ्य तो यह है कि तकनीक को ओढ़ने और प्रयुक्त करने का समय जब जब होता है तब तब ये अ
ना रास्ता स्वयं खोजती हैं। विश्व में आज कोई भी ऐसा देश नहीं है जहाँ आईटी तकनीक का प्रयोग छोटे से छोटे से काम में नहीं किया जाता हो। और जहाँ तक भारत के साफ्टवेयर हब बनने की यशोगाथा की बात है तो इसमें टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, जैसी कम्पनियों की मुख्य भूमिका थी न कि कांग्रेस सरकार की, जो बड़ी बेशर्मी से श्रेय लेने की कोशिश करती है।
और यदि राजीव गांधी वास्तव में देश में कम्प्यूटर लाए थे, तो मुझे विश्व के किसी भी उस देश का नाम बता दीजिए जहाँ राजीव गांधी जैसे नेता के अभाव में कम्प्यूटर तकनीक वर्ष 2000 तक न पहुंची हो?
आज से लाखों वर्ष पूर्व मानव ने चकमक पत्थर से आग जलाना सीख लिया था। पहले मानव पत्थरों का प्रयोग हथियारों के रूप में करता था, क्योंकि जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा के लिए उसे नैसर्गिक प्रस्तरखंड ही सहज रूप में उपलब्ध थे। इन प्रस्तरखंडो से जानवरों का शिकार कर उसने अपनी भोजन की समस्या का हल भी ढूंढ निकाला। उसने पत्थरों को धारदार बनाकर उन्हें चाकू व छूरी की तरह बनाया, ताकि शिकार करते में उसे आसानी रहे। ऐसी प्रस्तरयुगीन कई हथियार दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं।
    ताम्रयुगीन क्षेत्र
दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में ताम्रयुगीन मानवकृतिवाले हथियार और भालेवाले हथियार भी प्रदर्शित है। ये उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं के निकट की सोत नदी और उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के पास की किसी नदी से मिलते है।
    संसार की ताम्रयुगीन सभ्यताओं में कुल्ली, झोब, अमरीनल और केटा की सभ्यताएं अधिक विकसित और प्रसिद्ध रही है। भारत मंे उत्तर प्रदेश का रूहेलखंड क्षेत्र प्राचीनता की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है। इस क्षेत्र से मानव के प्राचीनतम पुरावशेष लगभग छह हजार वर्ष पुराने, अब तक पुरान्वेषियों को मिल पाये है। छह हजार वर्ष पूर्व अर्थात् सिंधु सभ्यता से पूर्व की सभ्यता जिसे ‘ताम्रयुगीन सभ्यता’ भी कहते हैं, किसी समय इस क्षेत्र में विकसित थी। प्रमाणस्वरूप ताम्रयुगीन सभ्यता के पुरावशेषों में वे भालेनुमा हथियार और तांबे की मानव आकृतियां महत्वपूर्ण हैं, जो गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारों से मिली हैं।
    सोत नदी के तट से प्राप्त एक ताम्रयुगीन हथियार मथुरा के राजकी पुरातत्व संग्रहालय को चंदौसी पुरातत्व ‘ग्रहालय ने अभी हाल में ही भेंट किया है। यह हथियार वहां विशेष महत्व के साथ प्रदर्शित है। इसका आकार लगभग नौ इंच है और इसकी बनावट इतनी परिष्कृत है कि देखकर आश्चर्य होता है। ऐसे हथियार बिसौली के समीप से भी मिले है।
    इस हथियार अथवा भालफलक का तांबा इतना शुद्ध है कि परातत्ववेता अचंभित है। यह हथियार चंदौसी संग्रहालय के संस्थापक सुरेन्द्र मोहन मिश्र को एक ग्रामीण द्वारा दिया गया था। उसे वह नदी के किनारे खेत की जुताई के दौरान मिला था और उसके फावड़े की चोट से खंडित हो गया था। अतः वर्तमान स्थिति में वह शस्त्र दो भागों में है।
    जनश्रुतियों का करिश्मा
    इस हथियार के समाचार जब समाचार-पत्रों में छपे तो आम जनता में कौतुहल जागा, क्योंकि संवाददाताओं ने जनश्रुतियों के आधार पर इसे भगवान राम का बाण घोषित किया था। संसद में इस पर बहस हुई और स्पष्टीकरण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से जानकारी लेने को कहा गया। पुरातत्व विभाग ने चंदौसी संग्रहालय से इसका विवरण तार द्वारा मांगा।
    कानपुर के पास बिठुर नामक स्थान पर आज भी एक मंदिर में तांबे के इन शस्त्रों की पूजा भगवान राम के बाणों के रूप में होती चली आ रही है। एक जनश्रुिित के अनुसार, ये हजारों वर्षे पहले छोडे गये भगवान राम के ही बाण है। हजारों वर्षो से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही ये मान्यताएं भारत के प्रायः उन सभी स्थानों पर प्रचलित है, जहां पर इस तरह के हथियार मिलते रहे हैं। लेखक द्वारा ताम्रयुगीन ध्वंसावशेषों की शोध के दौरान इस क्षेत्रों के ग्रामीणों ने जो जानकारियां दी हैं, उनके अनुसार उन्हें काफी पहले यहां पांच-पांच फुट बड़े शस्त्र और मानव आकृतियां मिली थी। जिन्हें उन्होंने बर्तन-विक्रेताओं को गलने के लिए दे दिया। जिन बर्तन-विक्रेताओं ने इन्हें खरीदा था, उन्होंने भी इस तथ्य की पुष्टि की है।
    ताम्रयुगीन काल की कुछ तांबे की मानव सदृश आकृतियां भी संग्रहालयों को मिली है, जिनके उपयोग के विषय में अभी मतभेद है। कुछ पुराविद् इन मानवकृतियों को पूजा के उद्येश्य से बनाया गया बताते हैं, तो कुछ विद्वान इन्हें ‘बुमैरंग’ किस्म का हथियार बताते है। यह हथियार शत्रु पर प्रहार करने के बाद शिकारी के पास वापस आ जाता था। दूसरा मत सत्यता के कुछ अधिक समीप लगता है, क्योंकि इस मानव आकृति के शीर्ष भाग को विशेष रूप से मोटा बनाया गया है, ताकि संतुलन और गति इसके उद्येश्य को पूर्ण कर सकें। ऐसे हथियारों में कुल्हाड़ी की तरह का शस्त्र भी प्राप्त हुआ है।
    रूहेलखंड की नदियों के तट से प्राप्त ये शस्त्र इस बात के द्योतक है कि यहां आज से छह-सात हजार वर्ष पूर्व एक ऐसी सभ्यता विकसित हो रही थी, जिसे इस क्षेत्र की प्राचीनतम सभ्यता कहा जा सकता है।
    इन हथियारों का प्रयोग करने वाले लोगों का रहन-सहन और खानपान कैसा था, यह ज्ञात करने के लिए जहां इन पुरावशेषों का सहारा लेना पड़ेगा, वहीं इन शस्त्रों के प्राप्ति-स्थान का भी सर्वे करना जरूरी होगा। प्रस्तर युग के किसी भी प्रकार के चिन्ह इस क्षेत्र से अब तक मिल सके हैं। यही कारण है कि रूहेलखंड के प्राचीन इतिहास को ताम्रयुग से ही प्रारंभ हुआ माना जाता है।
    यदि भारतीय पुरातत्व विभाग उन ऐतिहासिक स्थानों की गंभीरता से खोजबीन करें, जहां ताम्रयुगीन हथियार मिले हैं, तो हो सकता है कि भारत का ताम्रयुगीन इतिहास अमरीनल, झोब, केटा और कुल्ली सभ्यताओं से भी विशाल बन सकें।

अतुल मिश्र
संसार के विभिन्न देशों में आग और उसके अविष्कारक से सबंधित अनगित पौराणिक कथाएँ (मिथक) आज भी प्रचलित हैं, जो बाहतः अत्यंत ही दिलचस्प हैं पर सारतः हैं काफी गंभीर व महत्वपूर्ण। इन्हें मात्र कपोल-कल्पना नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन मिथकों की रचना, उन आदिम लोगों ने की, जो संसार का बोध पाने, उसे समझने, उसमें अनिवार्य संबंध देख पाने तथा कार्य-करण संबंध ढूंढ पाने की कष्टसाध्य कोशिश कर रहे थे।
    ग्रीक आख्यानों में प्रोमैथ्यूज का उल्लेख मिलता है, जो अग्नि को स्वर्ग से चुराकर मृत्यु लोक में लाया था। वास्तव में प्रोमैथ्युज ग्रीक पुराण कथाओं का महान् सांस्कृतिक नायक है, जो टिटन आयोपेटस व क्लाईमीन का पुत्र और एटलस मेनोईटस व एवी मैथ्युज का भाई था। इसोइड ने उसकी कथा इस प्रकार कही है- एक बार ज्यूस के शासन के अधीन देवताओं और मनुष्यों के बीच मैकोन में यह विवाद उठा कि बलि-पशुओं का कौन सा अंश देवताओं को अर्पित किया जाए। प्रोमैथ्यूज ने ज्यूस की परीक्षा लेने हेतु एक बैल को मारकर उसके सवोत्तम अंश को गोबर से ढक दिया तथा दूसरी और केवल हड्डियों की चर्बी से ढक कर रख दिया। ऐसा करने के बाद ज्यूस से चुनाव करने के लिए कहा गया किन्तु जब उसकी समझ में यह कपट जाल आया तो उसने मांस फेंकने के लिए आग को बाहर निकाला, लेकिन साथ ही साथ उसने यह वर्जना भी रखी की पृथ्वीवासी आग का इस्तेमाल न करें। यह देख प्रोमैथ्युज चालाकी से एक खोखली नली में अग्नि चुराकर धरती पर ले आया।
    कुछ भारतीय विद्वानों का मानना है कि ग्रीक आख्यानों का यह नाम, प्रोमैथ्यूज का उद्भव संस्कृत पद प्र$मंथ से हुआ है। क्योंकि अग्नि का आर्विभाव पहले मंथ प्रक्रिया से किया गया था। इस आधार पर उसके विश्लेषण के अनुसार, प्रोमैथ्यूज के नाम से संबंध पुराण-कथा का उद्भव भी भारत में हुआ और यहीं से विदेशों में फैली, इस सदंर्भ में चैम्बर्स विश्वकोश में दी गई बातें ध्यान देने योग्य हैं।
    ग्रिफिथ के अनुसार (जिसने यजुर्वेद के मंत्रो का अनुवाद किया था) .............. आप पुरीष्य (पशु-पोषक) है, विश्व-भर के आश्रम हैं, अर्थवन ने ही, हे अग्नि! सबसे पहले आपका मंथन किया था। हे अग्नि! अर्थवन ने कमल से मंथन करके पुराहित विश्व के सिर पर तुम्हारा आर्विभाव किया था। ‘त्यागमग्ने पुरूष्करादध्यथर्वा निरमंथत। मूघ्नो विश्वस्य बाधतः’ (ऋ 6.16.13, यजु. 15.22)
 अर्थवन या अथर्वा, जिन्हें अंगिरस भी कहा जाता है, संभवत आग के पहले आविष्कारक थे। इसीलिए उनका नाम अंगिरस हो गया। उनके नाम पर अग्नि का मंथन करने वालों की पूरी जाति अंगिरस के नाम से विख्यात हुई। आज भी भारत में इस गोत्र के लोग मौजूद हैं। यह भी कहा जाता है, उसका हिन्दी भाव इस प्रकार है-
    यजुर्वेद के श्लोक (8ः56) पर ग्रिफिथ की, जो टिप्पणी है, उसका हिन्दी भाव इस प्रकार है-
    अर्थवन एक प्राचीन ऋषि, जिसने सर्वप्रथम आग की खोज की तथा अग्नि की पूजा शुरू करवाई। इनके द्वारा अग्नि की खोज किए जाने के बाद बहुत से अंगिरस गोत्रीय आग के मंथनकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए, जिनकी चर्चा वेदों में अनेक जगह की गई है। उस समय लकड़ी से सफलतापूर्वक आग निकालना आसान काम नहीं था।  इसलिए तत्कालीन समाज मंे अंगिरसों की बड़ी आवभगत होती थी।
    इस संदर्भ में विल्सन का कहना है कि ऋग्वेद में अंगिरस शब्द का प्रयोग अग्नि के पर्याय के रूप में किया गया है, जबकि उनका नाम मनुस्मृति तथा सभी पुराणों में एक ऋषि या प्रजापति के रूप में किया गया है, उनके ब्रह्मा का एक रूप आदिम मानुसपुत्र बताया गया है।
    यदगदाशुषे त्यमग्ने भद्रं करिष्यसि। तयेत्तत् संत्यमडिगरः। (ऋ. 1.1.6)।
    मनुष्यमदग्ने अगिरस्मर्दागरा ययाति वत्सदने पर्ववच्छुये।। (1.31.17)
अर्थात् हे, विशुद्ध अग्नि, तुम चलते रहो, वेदी सदन के सम्मुख जाओ, जैसे मनु, अंगिरस ययाति और अन्य लोग पहले जाया करते थे।
    महाभारत में एक कथा है, जिसमें अग्नि को ‘सह’ बताया गया। राजा भरत के पुत्र नियम के दाह-संस्कार के समय अग्निदेव समुद्र में जाकर छिप गए। वास्तव में वह नियत के दाह-संस्कार में हिस्सा लेना नहीं चाहते थे। जब देवताओं ने यह देखा कि अग्नि गायब है तो उनकी खोज में निकले। घूमते हुए धरती पर पहुँचे। उन्होंने अर्थवन को यह काम सौंपा। कठिन परिश्रम के बाद अर्थवन ने लकड़ी से अग्नि पैदा की तथा देवताओं का काम चलाया।
    भारत की तरह टोगा द्वीप-समूह में, जो प्रचलित धारणा है, वह भी यथार्थ के निकट लगता है। इस द्वीप समूह में आज भी ऐसा कहा जाता है कि भूकम्प के देवता ही आग के देवता हैं। मंगाइयों में अनुरूुति के महान् माउई नरक में गया, जहाँ उसने दो लकडि़यों को रगड़कर आग पैदा करने के रहस्य का पता लगाया। माओरी जाति के लोग इसे दूसरी तरह कहते हैं। उनके अनुसार, माउईने बुढ़ी, दादी माहुईका से आग प्राप्त की, जिसने अग्नि अपने हाथ के नाखूनों से निकाली थ।
    फिनलैंड की प्राचीन कविताओं में पाया जाता है कि सूरज का बेटा-आग स्वर्ग से नीचे ले आया। एस्तोनियों में प्रचलित दंतकथा के अनुसार, वहाँ के स्थानीय देवता उक्को ने अपने लोहे के डंडे से पत्थर पर चोट करके अग्नि पैदा की। वेस्टर्न प्वाइंट, विक्टोरियों के आस्ट्रेलियावासियों में यह धारण प्रचलित है कि भले बूढ़े पुणदिल ने अपने संदूक का द्वार खोल दिया और उसका प्रकाश धरती पर पड़ा। भले आदमी का लकड़ी कराकोरक ने जब धरती को सांपो से भरा हुआ पाया तो वह सांपो को नष्ट करती हुई हर जगह गई पर इसके पहले कि वह सभी सांपो का नाश कर पाती, उसकी लाठी दो हिस्सों में टूट गई। उसके टूटते ही उससे आग की ज्वाला निकली। फारसी के ‘शाहनामा’ में भी आग की खोज करने वालों को, नागों को मारने वाला बताया गया है। प्रतापी नायक हुर्शेक ने भयानक सांप के ऊपर बड़ा भारी पत्थर फेंका, जो सांप के एक ओर हट जाने से एक दूसरी चट्टान से जा टकराया और उससे चिंगारियां फूट पड़ी। पेरूवासियों के पिता गुना मानसुरी ने गुलेल से पत्थर फेंक कर बिजली और गरज पैदा की थी।
    ऊपर जितनी भी बातें आई हैं, उसका संबंध प्राचीन मिथकों से हैं। इनमें सच्चाई की मात्रा कितनी है, निर्णय के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन लगभग सभी कथाओं में घर्षण से आग उत्पन्न करने की बात दिखती है, जो वास्तविकता भी है। क्योंकि आज से हजारों वर्ष पहले ‘होमोइरेक्टस’ (सीधा तना हुआ मानव) घर्षण से आग पैदा करता था। इससे पुरातत्वेता व इतिहासज्ञ भी मानते हैं। रही बात अग्नि के आविष्कारक की, तो इस संदर्भ में कई भारतीय इतिहासकारों का दावा है कि वास्तव में अंगिरस ने ही सर्वप्रथम अग्नि का आविष्कार किया।

-सुभाष सरकार

कुंभकर्ण ने एक से एक बढ़कर अलौकिक शस्त्रों के आविष्कार भी किये थे, जैसे शत्रु को अंधा, बहरा, पागल कर देने वाला दर्शन श्रवण्पा यंत्र आदि।
    हजारों वर्षो के भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं भूगर्भ शस्त्र के महान विद्वानों द्वारा की गयीं आधुनिक नवीनतम खोजों के अनुसार जिस प्रकार यह सत्य सिद्ध हुआ है कि रावण की वास्तविक रामायण कालीन लंका जो शून्य अंश-अक्षांस तथा 15 दशमलव 50 अंश देशांश पर स्थित थी, समुद्र में डूब चुकी है, उसी प्रकार यह रोमाचंक सत्य भी सामने आया है कि रावण का तीसरा भाई कुंभकर्ण अनुपम योद्धा, पं्रचड ईश्वर-भक्त तथा प्रसिद्ध शिक्षक होने के साथ ही संसार के प्रसिद्ध वैज्ञानिक भी था। जैसे वर्तमान श्रीलंका अब वास्तव में में रामायणकालीन सिंहल द्वीप मानी जाने लगी है वैसे ही कुंभकर्ण के संबंध की अब तक की यह मान्यता भी झूठ साबित हुई है कि वह महान आलसी, छह माहों तक सोने वाला तथा छह माहों तक जागने वाला केवल एक निकम्मा लंपट राक्षसराज था।
    सच्चाई यह है कि वह गुप्त रूप से लंका से छह माहों के लिए अमरीका व हिमालय के भयानक जंगली क्षेत्रों में जाकर वहां न केवल विज्ञान के नये प्रयोग करता था, बल्कि अपने बनाये अंतरिक्षयानों में बैठकर मंगल, बुध आदि अनगिनत ग्रहों की सैर कर लंका वापस लौटकर छह माहों तक वहां की प्रसिद्ध प्रयोगशालाओं में छात्रों में को अपने खोजपरक ज्ञान से परिचित कराता था। यह कुंभकर्ण की वैज्ञानिक सिद्ध शक्तियों का ही प्रताप था, जिसके बल पर रावण ने इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था। जिसका विशालता की टक्कर इस धरती पर कोई नहीं ले सकता। (संभयतया) पाठक जाने ही हैं कि रोवण के साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था और वह लंका, विंध्याचल पर्वत के दक्षिण का भारत आस्ट्रेलिया, पूर्वी द्वीप समुदाय, साईबेरिया, चीन, अफरीका, ईरान, अफगानिस्तान, अरब, मिस्त्र, द. अमेरिका तथा अब जलमग्न अटलांटिस और म्यू द्वीपों तक फैला था।
    राम के समकालीन महर्षि श्रृंगी व उनके प्रिय शिष्य महानंद के ग्रंथो, वाल्मीकि रामायण, तेलगु की कम्ब तथा रंगनाथ रामायणों, कन्नड़ की परंपरागत तथा मलयालम की आध्यात्मक रामायण सहित अनेक ऋषियों तथा संस्कार धानी जबलपुर के विद्वान श्री गोमती शंकर शुक्ल के अत्यंत मौलिक ग्रंथ ‘गाथा राम रावण’ में वर्णित तथ्यों के आधार पर कुंभकर्ण की रहस्यमयी वैज्ञानिक उपलब्धियों निम्नानुसार थींः

    अद्भूत प्रयोगशालाएं

    अति आश्चर्यजनक प्रतिभा के धनी कुंभकर्ण ने प्रांरभ से ही कट्टर सात्विक जीवन बिताया था तथा अपनी प्रचंड शिवभक्ति के बल पर ही उसने भगवान शंकर से रावण से भी बढ़-चढ़कर दुर्लभ वैज्ञानिक सिद्धियां प्राप्त की थी। महर्षि भारद्वाज के आशीष से निद्रा पर विजय प्राप्त कर वह रात-दिन अपने वैज्ञानिक प्रयोगों व अनुसंधानों में ऐसा जुटा था कि कुछ वर्षो में ही उसने इच्छा चालित विमानों, उड़नेवालें रथों, अद्भुत अंतरिक्षयानों तथा भयंकरतम अस्त्रशस्त्रों का आविष्कार कर सारी दुनिया में धूम मचा दी थी। रावण ने अपने लंका में उसी के सहयोग से संसार प्रसिद्ध दर्जनों विज्ञान विश्वविद्यालय तथा सैंकड़ों अद्भुत वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं खोली थीं, जिनका प्रमुख स्वयं कुंभकर्ण था जो अपने सहयोगियों सहित विद्यार्थियों को भौतिक व आध्यात्मिक विज्ञान का प्रशिक्षण देता था। साथ ही रावण ने जब खुद भगवान शंकर को लंका में आमंत्रित कर उन्हें अपनी ये प्रयोगशालाए दिखलायी थी, तब उन्होंने उन दोनों को आर्शीवाद देते हुए आदेश दिया था कि वे अपने आविष्कारों का सदुपयोग मानवता के कल्याण के लिए ही करें, क्योंकि विनाश के लिए करने से सारी सृष्टि का अंत हो जाएगा।

    वास्तविक कार्यक्षेत्र: दक्षिणी अमरीका

विद्वानों के कथनानुसार-कंुभकर्ण ने अपनी रहस्यमयी विज्ञान साधना के लिए भारत को कभी नहीं चुना। वह हिमालय तथा तिब्बत के साथ ही दक्षिणी अमरीका (उन दिनों का पाताल लोक) के पेरू, मेक्सिकों, एरीजोना, यूकातान, ग्वाटेमाला तथा होंडफराज आदि उन क्षेत्रों से संबंधित था जिसमें दुनिया के  लाखोां वर्ष पुराने मय सभ्यता वासियों का वास था। यह उसका सौभाग्य था, क्योंकि यूरोप के विश्वप्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक व इतिहासवेत्ता प्लेटों के ग्रंथों के अनुसार मय जाति के पूर्वज अंतरिक्ष के किसी अज्ञात ग्रह से उतरकर उपर्युक्त क्षेत्रों सहित अटलांटिस द्वीप (अब जलमग्न) में बस गये थे। द्रविड़ सभ्यता के पोषक राक्षसराज रावण ने उपर्युक्त क्षेत्रों में अपना साम्राज्य स्थापित किया तथा कुंभकर्ण सहित उसे भी मयजाति के लोगों से ही वैज्ञानिक अनुसंधानों व सिद्धांतों का अपार भंडार मिला था। प्राचीनमय-संस्कृति व सभ्यता के खोजी विद्वान क्रेग तथा एरिक अमलैंड के अनुुसार इन क्षेत्रों में उतरे दूसरे ग्रहवासी ही अपने साथ अंतरिक्षयान, बिजली, एक्सरे, टेलीविजन आदि की विद्या लाये थे। इस बात की पूर्ण संभावनाएं है कि वैज्ञानिक कुंभकर्ण ने भी उनसे ये विद्याएं सीखकर बदले में उन्हें भी अपनी स्वयं की वैज्ञानिक उपलब्धियों से परिचित कराया होगा। इस वैज्ञानिक लेन-देन से कुंभकर्ण को दूना लाभ हुआ और वह आविष्कारों की दौड़ में चमत्कारी रूप से सारी दुनिया में सबसे अधिक बढ़ चढकर माना जाने लगा था।

    सुदूर ग्रहों का भ्रमण

    रावण तथा अपने विशाल साम्राज्य को दुर्लभ वैज्ञानिकों उपलब्धियों (चमत्कारी, चिकित्सा पद्धति, एक्सरे, बिजली, दुरदर्शन फोटोग्र्राफी इच्छाचालित यानों उडन रथों, अंतरिक्ष यानों आदि) से समृद्ध कर सुदूर अंतरिक्ष ग्रहवासियों से संपर्क साधने की इच्छा से कुंभकर्ण ने  अपने अंतरिक्षयानों पर बैठकर जब पहली बार मंगल ग्रह की यात्रा की तो वहां से लौटकर उसने रावण को सूचित किया था कि मंगल में भी धरती वासियों जैसे मानव सभ्यता है, (आज की बीसवीं सदी के वैज्ञानिकों ने भी मंगल ग्रह में प्राणियों के होने की पुष्टि की है) कुंभकर्ण ने अंतरिक्ष में जहां-तहां घूमते विनाशक उल्का पिंडो का भी उल्लेख किया था।

    रावण के कारण सर्वनाश

    कुंभकर्ण ने एक से बढ़कर एक अलौकिक शस्त्रों के आविष्कार भी किये थे, जैसे शत्रु को अंधा, बहरा, पागल कर देने वाला दर्शन श्रवण यंत्र आदि। इस बीच रावण अपने विशाल साम्राज्य तथा विराट संपदा केू कारण दंभी व भयानक भ्रष्टाचारी होकर घोर आतंक फैलाता हुआ राम की सीता को चुरा लाया। इससे क्रुद्ध होकर स्वयं शंकर सहित समस्त देवताओं ने राम मदद की और उन्होेंने जब अपनी विशाल वानर सेना सहित लंका पर आक्रमण किया, तब रावण ने अपनी पराजय निकट जानकर कुंभकर्ण को राम से लड़ने के लिए बुलाया। कुंभकर्ण ने रावण को राम की सीता वापस देने की सलाह देते हुए जब उसे धिक्कारा तब रावण ने उसे कायर कहते हुए राम से युद्ध के लिए ललकारा।
        बस यहीं से कुुंभकर्ण की समस्त अलौकिक वैज्ञानिक उपलब्धियों का सर्वनाश होना प्रांरभ हो गया। यद्य़ति कुंभकर्ण को युद्ध करने का कोई सीधा अनुभव नहीं था, परंतु फिर भी उसने राम के विरूद्ध भीषण वैज्ञानिक युद्ध लड़ने का निश्चय किया। वह अकेला अपने बनाये पहाड़ की तरह विशाल फौलादी यंत्र दैत्य के भीतर बैठकर युद्ध भूमि में कूदकर राम की समस्त वानर सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगा। यह देश विभीषण कुंभकर्ण के पास उससे मिलने गये। कुंभकर्ण ने विभीषण से अपनी लाचारी का वर्णन करते हुए कहा, ‘‘ मुझे राम के अतिरिक्त कोई नहीं मार पाएगा और मुझे पता है कि मैं उन्हीं के हाथों मारा जाउंगा, क्योंकि मैने रावण की गलत आज्ञा मानकर घोर अपराध किया है जिसका सजा मेरी मृत्यु है।’’ विभीषणर ने वापस लौटकर राम को कंुभकर्ण का यह रहस्य समझाया कि जब तक उसके यंत्र दैत्य को नही गलाया जाएगा, तब तक वह नहीं मर सकता। विभीषण की चेतावनी को ध्यान में रखकर दूसरे दिन राम ने महर्षि विश्वामित्र द्वाीा दिये गये ऐसे अभिमंत्रित बाण कुंभकर्ण की ओर छोड़े जिनके कारण उसका पहाड़ जैसाप भीमकाय यंत्र दैत्य मोम की तरह गलकर नष्ट हो गया। जैसे ही कुंभकर्ण यंत्र दैत्य से बाहर निकला वैसे ही राम ने एक बाण से उसे मार गिराया। इस प्रकार अत्याचारी रावण कार साथ देने के कारण दुनिया के महानतम वैज्ञानिक कुुंभकर्ण  का दुखद अंत हो गया तथा उसी के साथ उसकी सारी वैज्ञानिक उपलब्धियां भी नष्ट-भ्रष्ट होकर लुप्त हो गयीं।
    कुंभकर्ण की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र सुमेतकेतु अपने पिता की वैज्ञानिकता में इसलिए कोई प्रगति नहीं कर सकता, क्योंकि वह काफी पहले से ही रावण की आतंककारी गतिविधियों से विरक्त होकर सन्यासी बन गया था।

    -दीवान गबहाुदर वल्लभदास

    महल, जबलपुर