अपने लेख, कविता, कहानियां अथवा अन्‍य लिखित सामग्री इस ब्‍लाॅग पर प्रकाशित करवाने बारे में हमें tiwarijai222@gmail.com पर ई-मेंल करें और हिन्‍दी साहित्‍य के उत्‍थान में अपना योगदान दें
नया क्‍या है
जारी हो रहा है

प्रिय पाठकों एवं मित्रों हमने एक नये ब्लाॅग Azad Indian की शुरूआत की है आप सभी से अनुरोध कृपया सभी इस ब्लॉग को अपना स्नेह एवं प्यार देकर सफल बनाये


ब्लॉग पूरी तरह से भारतीय संस्कृति और भारतीय स्वन्त्रता सेनानियो के जीवन परिचय से परिपूर्ण है
http://azadindian.com
इस लिंक के जरिये आप ब्लॉग पर जा सकते है 







सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।

देखना है ज़ोर कितना बाजु ऐ कातिल में है।
-पंडित राम प्रसाद बिस्मिल
सुनिये पूरी ग़ज़ल
नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से






sarfaroshi ki tamanna rerprise
Sarfaroshi ki Tamanna Full Ghazal Poem Kavita
 


 कटे फ़टे छोटे कपड़ो मे अंग अपना दिखाती हो
 टांगे जितनी दिखेंगे नग्न उससे ही शान बताती हो
रुमाल जितनी ड्रेस पहन कर सड़क पर चलती जाती हो
कोई देख तुम्हे देवी कहे ये भी तुम जताती हो
 आधी नंगी टाँगे दिखाके आदमी को बहकाती हो
 जब कोई देखे घूर के उससे ही गलत तुम ठहराती हो

 इज़्ज़त ही चाहिए तो रहिये न इज़्ज़त से इस संसार में
क्यों तन दिखाकर खुद को ले जाती है देहव्यपार में

 नग्नता को आधार बना कर कौनसा नाम कमाना है
अरे बहन ये मत भूलो ये पुरुष प्रधान ज़माना है

थोड़ी सी कोशिश करो सभ्य नारीत्व जीवित करो
अर्धनगंता खत्म करो
और आज़ादी सिमित करो आधे आधे कपड़ो से आधा खुद को ढकती हो
और इन्ही कपड़ो से गली गली भटकती हो

तुम्हे लगता है तुम परी लगती हो
 पर तुम क्या जानो कितनो की आँखों में खटकती हो

 हो सके तो थोड़ा बदलाव तुम खुद लाओ
 नग्नता से नही खुद को बुद्धि से मजबूत बनाओ


 कम से कम इतनी तो बनाना की बाप भाई इज़्ज़त से बाहर निकल सके
 कोई उन्हें देख कुछ तुम्हारे लिए बोलने की कभी हिम्मत न कर सके

सोच छोटी है मेरी अब ये आप कहेंगी
लेकिन हम जैसे घरेलू महिला कब तक चुप रहेन्गे

 मैं बस यही कहूंगी की प्रभु चाहे ज़माना कितना ही अजीब हो पर आने वाले समय में बच्चो को बस माँ का आँचल नसीब हो!!


💝 अनन्या गुप्ता
हमारी पड़ोसन के मन में आजकल भारी प्रेम उमड़ रहा है इसके अनचाहे प्यार में न जाने कितने बेकार हो गये पता नहीं क्यों अनेकों दिलों की चाहत को इस तरह ठुकरा कर केवल पुस्त्क के प्रेम में दीवानी होकर इन किताबों से चिपकी रहती है। ऊपर से यही कहती फिरती है कि प्यार किया कोई चोरी नहीं की। खुदा खैर करे इसने प्यार ही किया कोई यार नहीं। वैसे तैयार बहुत थे पर पुस्तक प्रेम के पीछै पागल हुई पड़ोसन को भली-भांति परख लिया तो किनारा कर लिया। पड़ोसन भी बहुत भली है एक नाजुक सी कली है। भले ही पुस्तक अपनी नहीं परायी है मगर इसने हर हाल में अपनायी है। बीबी हो तो ऐसी जो पराये मर्द को पास फटकने दे। सिर्फ पुस्तकें पढऩे से काम कैसे चलता यही सोचकर इसने छोटे बच्चों की पाठशाला खोल ली। जो स्वयं पढ़ती उसे बच्चों को सुनाकर जुगाली करती। कम से कम चुगली करने से बच जाती है पर बच्चों का दिमाग बहुत खाती है। प्रेमी तो संसार में विभिन्न प्रकार हैं लेकिन हमारी पड़ोसन सचमुच पुस्तक प्रेमी है। इसने कभी किसी की परवाह नहीं की अपने पति परमेश्वर को अक्सर प्रसन्न रखने के प्रयास में नई पुस्तकें लाने का प्रस्ताव रख देती बेचारे पड़ोसी बहुत परेशान है आखिर वो भी तो एक इन्सान है कोई जानवर तो है नहीं। पुस्तक की मांग को ध्यान में रख फिर भी हर हाल में अपना पति धर्म निभाते हैं। दुनिया को दिखाते है कि देखो हमारी धर्मपत्नीजी कितनी लिखी पढ़ी है। इसने मात्र पांच साल में तीन हजार पुस्तकें पढक़र विश्व रिकार्ड बनाया है। पुस्तक के अलावा इसे कुछ सूझता ही नहीं। खाना पकाना भी पुस्तक से पढक़र सीखी है। अब बेचारे पड़ोसी पर क्या बीती है आपको क्या बताये। पड़ोसी की सारी पूंजी पुस्तक में लगाकर पड़ोसन भले ही प्रसन्न हो पर पड़ोसी कदापि नहीं परमात्मा से प्रार्थना करता कि इसे परमधाम पहुंचा दे। प्यार की कोई सीमा होती है। हद से ज्यादा प्यार संसार को मंजूर ही नही। ये सारी बाते एकांत में बेठकर पंडित भूलेराम जी चौपाटी ने हमारी पड़ोसन को बड़े प्यार से समझाई मगर इसके समझ में न आई। माना कि प्यार करने का अधिकारी सरकार ने संसार में सबको बराबर दिया है फिर भी किसी ने ऐसा प्यार स्वीकार नहीं किया। हर बार प्यार में धोखा खाकर और अच्छा मौका पाकर बेवफा की भूमिका निभाते चले आ रहे हैं। एक हम है कि पड़ोसन की महिमा ही गा रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह पुस्तकों की पीड़ा भी नहीं समझती केवल किताबी कीड़ा बनकर उन्हें चाटती है। घटिया पुस्तकें पढ़ती है और दोष हमारे सिर पर मढ़ती है।
पुस्तक प्रेमी बनने से तो अच्छा था किसी फिल्मी कलाकार की प्रेमिका बन जाती जिससे अपने आप प्रसिद्धि मिलती। खैर अभी कुछ बिगड़ा नहीं है प्रयास करने पर सफलता जरूर हाथ लगेगी। प्रेमिका बनने पर निश्चित ही किस्मत खुलेगी। अब इन पुस्त्कों में पुरानी बातों के अलावा रखा ही क्या है। आज के इस अत्याधिक आधुनिक युग में सदा नवीन चाहिए। प्रेमी भी सुन्दर, सुशील और हसीन चाहिए। फटी पुरानी पुस्तकें पढऩे से भला क्या हासिल होगा। नये प्यार को पाने का प्रयत्न भी करना चाहिए। हमारी ज्ञानवर्धक बातें पड़ोसन के मन में मस्तिषक में भला कैसे बैठती उसमें तो पहले से ही जमाने भर का कचरा भरा है। पुस्तक पढऩे की लत में इसकी मत भी मारी गई। प्रत्येक पुस्तक को अपने पास संजोकर रखने वाली सर्वश्रेष्ठ पाठिका बिल्कुल श्रीकृष्ण की राधिका जैसी लगती है। जबकि राधा-कृष्ण का प्रेम अनूठा था मगर पडोसन का प्यार आधा सच्चा, आधा झूठा है। यदि सच्चा प्यार होता तो घर में एक बच्चा भी होता। बाल बच्चे को छोडिये बेचारे पतिदेव की परवाह भी नही की।
पुस्तक के पूरे पाठ तो कभी पढेे नहीं सिर्फ शीर्षक पढऩे से सम्पूर्ण सबक का ज्ञान कहां से प्राप्त होता फिर भी पुस्तक प्रेमी पड़ोसन जबरन अपना नाम गिनीज बुक में लिखाने को तुली है। अब सरकार भी क्या करे वह स्वयं मिलीजुली है। पुस्तक प्रेमी का सर्वोच्च सम्मान पाने को आतुर पड़ोसन ने पिछली बार को सरकार को गिराने की ठाल ली थी। बाद में बहुत सी बेकार की बातें मान ली थी। जिससे सरकार बच गई वरना कब की बदल जाती। वैसे भी पड़ोसन का प्रभाव आम जनता पर कम अपने पति पर ज्यादा पड़ता है। तभी तो बेचारा हर फरमाईश पूरी करता है। करवा चौथ को सैकड़ो पुस्तकें अपनी पत्नि को सौप कर यही सोचते रहा कि पुस्तक रूपी सौत मेरी पत्नि की जगह मेरे जीवन में न जाने कहां से आ गई। कितनी भी घटिया किताब क्यों न हो किन्तु इसके मन को सहज की भा गई। अब मैं क्या करूं कुछ समझ नहीं आता। पत्निव्रत को भलीभांति निभाते हुए पड़ोसी वीरगति को प्राप्त हुआ पर पड़ोसन में कोई परिवर्तन नही। पुस्तक के पीछे पागल होते जा रही है ऊसर से मोहल्ले वालो का दिमाग खा रही है। हमें क्या फर्क पडेगा हमने तो इसे स्वतन्त्र छोड़ रखा है जिसने कुछ भला हमारा भी हो सके। दिन-रात पुस्तक पढऩे से हमारा यही फायदा है कि इन्हें लडऩे झगडऩे का अवसर नहीं मिल पाता वरना बिना लडाई झगडैे के कोई पड़ोसन आज तक कभी चुपचाप बैठी है। भला हो भगवान का जो ऐसी भाग्यवान, ज्ञानवान पडोसन प्रदान की जो कम से कम मौन व्रत का पालन तो करती है। लड़ती है न झगडती है सिर्फ पुस्तक पढ़ती है। पढे लिखे होने का गर्व हमें कभी महसूस नहीं हुआ परन्तु पड़ोसन पर अभिमान जरूर होता है। जबकि हर इन्सान अच्छी पड़ोसन को पाने के चक्कर में अवश्य पीटता है। कुछ लिखता भी है तो कोई पढ़ता नहीं पढऩे वाली पुस्तक प्रेमी पड़ोसन बड़े भाग्य से मिलती है। यदि मिल जाए तो समझ लेना खुल गई किस्मत। किस्मत के धनी मेरे जैसे लोग शायद ही कही मिले इसलिए मिलने का समय निर्धारित कर दिया है। सुबह 8 से 10, शाम 7 से 9। रात्रि नौ के बाद नौ दो ग्यारह हो जाते हैं फिर नजर किसी को नही आते हैं। शायद पड़ोसन से इश्क फरमाते हैं।
रामचरण यादव =याददाश्त=


बैतूल
‘जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान’ और ‘संतोषी नर सदा सुखी’ कहावत हमारे समाज में प्राचीनकाल से प्रचलित है। संतोष ही वह धन है, जिससे व्यक्ति को सुख मिलता है एवं वह आत्मसम्मान की जिन्दगी जीता है। वस्तुत: हमारे शासत्रों में संतोष को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। कहा गया है कि इन्सान के पास यदि सभी सुख-सुविधाएँ हो जाएं, करोड़ों की दौलत भी हो जाए या वह चाँद पर पहुँच जाए किन्तु जब तक उसमें संतोष नहीं है, वह कहीं सुखी नहीं रह सकता। यही नहीं मनुष्य में जब तक संतोष की भावना नहीं आती, वह शांति भी नहीं प्राप्त कर सकता। साथ ही वह सब कुछ होते हुए भी वह अशांत जिन्दगी जीता है और ताउम्र हाय-हाय करते हुए मर जाता है। ऐसे ही लोगों के लिए कहते हैं कि-
‘‘सुबह होती है, शाम होती है,
उम्र यूं ही तमाम होती है।’’
इसीलिए हमारे प्राचीन वेद, पुराणों में संतोष को मानव जीवन का पर्याय माना जाता है। साथ ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्म एवं परम्पराओं, धैर्य और संतोष का मिला-जुला संगम है। अपनी सहनशीलता एवं संतोष की भावना की वजह से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति अत्यन्त उत्तम एवं गरिमामय मानी जाती है। साथ ही हमारे देश के लोग संतोष होने की वजह से अनेकों कष्ट, भूख एवं गरीबी में रहने के पश्चात् भी संतोष में रहते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के लोग धन-दौलत के पीछे दीवाने रहते हैं। संतोष की झलक उनके व्यक्तित्व में कम ही मिलती है। लेकिन एक बार जिस व्यक्ति के जीवन में संतोष आ जाता है, उसका जीवन असीम सुख एवं शांति से भर जाता है। संतोष का सुख वह होता है, जो सागर की गहराई से निकाले मोती के समान होता है एवं एक बार जिसे यह सच्चा मोती अर्थात् संतोष मिल जाता है, उसके सामने दुनिया के सारे हीरे, जेवरात फीके पड़ जाते हैं। हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि एवं ऐसे उच्चकोटि के साधु-संत हुए हैं, जिन्होंने संतोष को प्राप्त संसार के समस्त सुखों का त्याग कर दिया और संसार में आदर्श स्थापित कर गए कि संतोष ही परमसुख है। असंतोष पतन का मार्ग है। अत: मनुष्य को संतोष की भावना हमेशा बनाए रखना चाहिए क्योंकि संतोष का फल सदा मीठा होता है। जहाँ तक संतोष का तात्पर्य है तो कहा जा सकता है कि संतोष वह आत्मबल है, जिसके वजह से मनुष्य क्रोध, लालच, काम, क्रोध एवं मोह की कुप्रवृत्तियों से ऊपर उठकर आत्मिक सुख के निकट पहुँच जाता है एवं निष्काम कर्म करते हुए फल की इच्छा-अनिच्छा से दूर हट जाता है। उसमें असीम धैर्य आ जाता है। यह धैर्य उसे आत्म-संतोषी बना देता है।
सामान्यत: हम संतोष का बाह्य संतोष एवं आत्म संतोष में विभाजित कर सकते हैं। बाह्य संतोष में व्यक्ति पूर्ण रूप से संतोषी नहीं बन पाता जबकि आत्म संतोष प्राप्त होने पर व्यक्ति निश्छल, निष्कपट और निष्काम होकर परम संतोषी हो जाता है। परम संतोषी व्यक्ति की आत्मा ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाती है एवं आत्मा-परमात्मा में दूरी कम हो जाती है। वैसे भी आत्म संतोषी व्यक्ति जीवन के सुख-दुख में अपना संतोष नहीं खोता और सुख-दुख, यश-अपयश, लाभ-हानि, जीवन-मरण में पूर्ण धैर्य और तटस्थ भाव अपनाकर चलता है। लेकिन हमारी प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता का यह मूलमंत्र की संतोष ही सच्चा सुख है, आज लोगों से दूर होता जा रहा है। अंधी भौतिकता के नशे में आदमी इस सच्चे मोती की चमक से दूर होता जा रहा है एवं असंतोष के अंधर में दिन-ब-दिन घिरता जा रहा है। एक दिन यह अंधकार उसे इतना अधिक घेर लेगा कि उससे उसका उबरना मुश्किल हो जायेगा। अत: आज इस बात की आवश्यकता लोगों में संतोष की भावना जगाई जावे और संतोष के स्थान में घर किए लोभ, लालच एवं स्वार्थ की भावना को निकाला जा सके। लोगों को भी अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में आस्था रखते हुए पुन: संतोष की भावना को पुन: बलवती बनाना चाहिए।
यह सच है कि बीसवीं शताब्दी के अंत में परिस्थितियाँ इतनी विषम हो चुकी हैं कि इन्सान के संतोष का दायरा तंग हो गया है। चारों तरफ मची लूटमार, अफरा-तफरी, चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार से इन्सान इतना तंग आ चुका है कि वह असामान्य, भयभीत, आशंकाग्रस्त होकर जी रहा है क्योंकि उसे अपना जीवन चारों ओर से असुरक्षित लगने लगा है। ऐसे में वह संतोष रखना चाहे तो भी नहीं रख पाता क्योंकि उसके जीवन में विसंगतियाँ इतनी अधिक हावी हो चुकी हैं कि अपने जीवन मूल्यों से न चाहते हुए भी कटता जा रहा है। नैतिक मूल्य, चारित्रिक दृढ़ता, ईमानदारी, धैर्य और संतोष जैसे मूल गुण मनुष्य से दूर होते जा रहे हैं। इन विषम परिस्थितियों में यदि कोई इन्सान सच्चाई, ईमानदारी एवंं संतोष से जीता है तो लोग उसे ‘मिसफिट’ समझते हैं। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विषम हों, विसंगति जीवन में कितनी भी आएं, ये संतोष ही है, जो इन्सान को हर परिस्थिति में जीने का संबल देता है। इसलिए आज आवश्यकता है, हमें अपना खोया संतोष वापस लाने की जीवन मूल्य लौटा लाने की।
मानव जीवन में संतोष आसानी से नहीं जा जाता। संतोष पाने के लिए जीवन में, अत्यन्त धैर्य, तपस्या एवं त्याग करना पड़ता है। तब कहीं जाकर संतोष का प्रकाश हमारी आत्मा को प्रकाशित करता है। लेकिन एक बार हमारी आत्मा में संतोष की ज्योति जल जाती है, तो हजारों दीयों की रोशनी भी इसके आगे फीकी पड़ जाती है। अत: आज आवश्यकता इसी बात की है कि हम अपने जीवन का खोया संतोष वापस लाएं और यह विश्वास दृढ़ करें कि संतोष ही सच्चे सुख का सागर होता है। एक बार इस सागर का जल हमारे जीवन में झरने लगता है तो ताउम्र झरता रहता है और मोक्ष तक खत्म नहीं होता। संतोष के अभाव में ही आज घर-परिवार बिखर रहे हैं। मान-सम्मान खत्म हो रहे हैं। इन्सान के पास सब कुछ होते हुए भी वह सुख्ी नहीं है। असंतोष की भावना ने उसे उग्र बना दिया है। जीवन में जब वह जागता है, तो उसे अहसास होता है कि वह व्यर्थ भौतिकता में घिर कर इधर-उधर दौड़ता रहा। अंत में उसका संतोष धन ही उसे परमसुख देता है और आत्मा को शुद्ध कर परमात्मा की तरफ झुका देता है।
इस बात में कोई शक नहीं है कि आत्मा-परमात्मा का मिलन ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है, तो जीवन की सच्चाई है। वास्तव में संतोष ऐसी स्वानुभूति हे, जिसकी अनुभूति मनुष्य को जो सुख देती है, वह लोखों-करोड़ों में से भी नहीं मिलती। आत्म संतोष से जो सच्चा सुख इन्सान को मिलता है, वह किसी अन्य से नहीं मिलता। वैसे भी यदि मन दुखी हो तो सारे सुख, सुविधा एवं वैभव फीके लगते हैं, क्योंकि हमारे वेद, पुराण, धार्मिक ग्रंथ सभी का आशय यही है कि आत्म सुख ही सच्चा सुख है और आत्म सुख संतोष से ही प्राप्त होता है। भौतिक सुख क्षणभंगुर होता है। इसलिए मनुष्य को जीवन में संतोष का दामन नहीं छोडऩा चाहिए एवं धीरज रखते हुए अपने जीवन में उन्नति करने का प्रयास करते रहना चाहिए। इस बात में भी कोई शक नहीं है कि संतोष रखकर आदमी जो प्रगति एवं विकास करता है, वह धीमा अवश्य होता है, किन्तु स्थायी होता है। संतोष के सहारे हुई प्रगति का सुख विरलों को ही नसीब होता है।
बढ़ते पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण एवं दिन प्रतिदिन फैलते मीडिया नेटवर्क ने लोगों को प्राचीन भारतीय संस्कृृति एवं सभ्यता से दूर कर दिया है। लोगों में आत्मिक सुख, संतोष की जगह अविश्वासी एवं उग्र बना दिया है। परिणामस्वरूप आदमी आज अपने ही अंधेरों से इस कदर घिर चुका है कि दो घड़ी शांति उसे नसीब नहीं है। सब कुछ होते हुए भी उसका मन उदास है क्योंकि भौतिक सुख-सुविधाएँ तो उसने जुटा ली हैं पर सच्चा सुख-संतोष नहीं जुटा पाया। लेकिन अब आदमी भौतिकता से ऊब रहा है और पुन: उसका झुकाव आध्यात्म, संतोष की ओर चला है। अत: सुख का सागर संतोष ही है, पैसा, धेला, धन-दौलत नहीं है, क्योंकि-
‘‘सुख का सच्चा सागर संतोष ही है,
असंतोष किसी के जीवन का
आधार नहीं हो सकता, क्योंकि
संतोष ही सुख के सागर में छिपा,
वह सच्चा मोती है, जिसकी
चमक कभी फीकी नहीं होती।’’



श्रीमती वन्दना सक्सेना, भोपाल
इस बात के कई सबूत पेश किये जाते हैं कि
विश्व के कई देशों में पहले सनातन धर्म ही था.
जी हाँ वही सनातन जिसको हिन्दू धर्म के नाम से हम सभी जानते हैं.
आज हम ऐसे ही एक देश की बात करने जा रहे हैं जिसके फ्लैग का चिन्ह भी हिन्दुओं का एक मंदिर है. लेकिन सालों पहले यहाँ एक गन्दा खेल खेला गया था जिसमें लोगों का धर्म परिवर्तन किया गया था. आज इस देश में गिनती के ही हिन्दू बचे हुए हैं लेकिन अच्छी बात यह है कि विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर भी यही है.

आइये जानते हैं इस देश को
कंबोडिया दक्षिण पूर्व एशिया का प्रमुख देश है.
इसकी जनसँख्या करीब 1.5 करोड़ है. कंबोडिया की राजधानी नामपेन्ह है. नामपेन्ह कम्बोडिया का सबसे बड़ा शहर भी है. कम्बोडिया में राजतंत्र है. सालों पहले इस देश में हिन्दू धर्म का बोल बाला था. प्राचीन समय में इस देश का नाम कंबुज या कंबोज था जो एक संस्कृत नाम था.
कंबोज की प्राचीन दंतकथाओं के अनुसार इस उपनिवेश की नींव ‘आर्यदेश’ के राजा कंबु स्वयांभुव ने डाली थी. वह भगवान शिव की प्रेरणा से कंबोज देश में आए और यहाँ बसी हुई नाग जाति के राजा की सहायता से उन्होंने इस जंगली मरुस्थल में एक नया राज्य बसाया जो नागराज की अद्भुत जादूगरी से हरे भरे, सुंदर प्रदेश में परिणत हो गया था. कंबु ने नागराज की कन्या मेरा से विवाह कर लिया और कंबुज राजवंश की नींव डाली थी.
किन्तु बाद में यहाँ पर विदेशी लोगों की नजर आई और उन्होंने यहाँ के हिन्दू लोगों का धर्म परिवर्तन तलवार के दम पर करा दिया. आज भी यह लोग दिल से खुद को हिन्दू ही मानते हैं.

विश्व का सबसे बड़ा मंदिर
अंकोरवाट मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है. यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है. यह कम्बोडिया देश के अंकोर में है जो सिमरिप शहर में मीकांग नदी के किनारे बसा हुआ है. यह हिन्दू देवता विष्णु का मंदिर है. इस मंदिर का निर्माण राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने 1112 से 1153 ईस्वी के दौरान बनवाया गया था. इस मंदिर के चित्र को कम्बोडिया के राष्ट्रीय ध्वज में छापा गया है. यह दुनिया के सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है. इसको यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल किया गया है.
बड़ा सवाल
लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि जिस देश के बारे में बोला जाता है कि जहाँ 100 फीसदी लोग हिन्दू धर्म को मानते थे तो आज वहां से हिन्दू कहाँ गायब हो गये है?
यह देश जहाँ विश्व का सबसे बड़ा मंदिर तो है किन्तु वहां हिन्दू लोग क्यों नहीं है? तो इस बात का जवाब इतिहास में लिखा गया है कि लोगों ने दूसरे धर्मों को अपना लिया है. लेकिन क्या यह अपने आप हुआ है जो जवाब नहीं में आता है.
आज कम्बोडिया हमें याद दिला रहा है कि अगर हम सभी अपनी संस्कृति और संस्कारों को भूला देंगे तो हम बहुत ज्यादा दिनों तक अपने धर्म को जिन्दा नहीं रख सकते हैं. साथ ही साथ यह उन लोगों के लिए भी एक उदाहरण है जो बोलते हैं कि भारत को कोई भी ताकत नहीं तोड़ सकती है.
सत्य यह है कि अगर हम अपनी सनातन जड़ों से कट गये तो जल्द ही हम भी टूट सकते हैं.

यह शीर्षक स्कन्द पुराण के एक श्लोक का चरण है। इसका अर्थ है पूर्व काल में विश्वकर्मा जी और ब्रह्मा जी का एक ही शरीर था अर्थात ब्रह्मा जी और विश्वकर्मा में कोई अन्तर नहीं है। जन साधारण जानते है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी माने जाते है इसलिए ब्रह्मा जी और विश्वकर्मा जी को प्रजापति के नाम से संबोधित किया जाता है। ब्रह्मा जी ने जिस कला कौशल के साथ सृष्टि कह रचना की है उसकी नकल विश्वकर्मा जी ने की ओर शिल्प विहीन जगत को अपनी कारीगगरी से चमत्कृत किया है,इस प्रकार ब्रह्मा जी और विश्वकर्मा जी का एकसा ही रचना कार्य हुआ।
    हिन्दू धर्म में जब देवी देवताओं की रचना हुई तो विश्वकर्मा जी को ब्रह्म का अवतार माना गया अर्थात् देवगणों में ब्रह्मा और विश्वकर्मा एक ही श्रेणी के देव माने गये। लेखक ने उत्तर भारत के अधिकांश संग्रहालयों में विश्वकर्मा जी की प्राचीनतम मूर्ति खोजने का प्रयत्न किया है परन्तु विशेष सफलता हाथ नहीं लगी। राजस्थान की राजधानी जयपुर तो कला की नगरी मानी जाती है। सम्पूर्ण भारत में देवी देवताओं की प्रतिमाएं जयपुर से ही निर्यात की जाती है, यहां के संग्रहालय में भी ब्रह्मा विष्णु के साथ विश्वकर्मा जी की सामान्य और आधुनिक छोटी सी प्रतिमा मिली है। जयपुर के दर्शनीय स्थल आमेर के महलों के पास उस्तां दलाराम के बाग में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ विश्वकर्मा की कुछ प्रतिमा प्रामाणिक ढंग से बनाई गई रक्खी है यह प्रतिमा दाढ़ी वाली है और जयपुर शहर के रचना काल में अर्थात् 250 वर्ष की बनी है। उस्तां दलाराम जी का जयपुर नगर रचना में विशेष हाथ है, हो सकता है उन्होंने अपने आराध्य देव की प्रतिमा को शास्त्रीय ढंग से बनवाया हो?
    ग्वालियर और मथुरा शहर के संग्रहालय भी प्रसिद्ध रहे है। दोनों में ही हमने संग्रहालय अधीक्षक से विश्वकर्मा जी की चर्चा की। मथुरा के संग्रहालय अध्यक्ष ने हम से स्पष्ट कहा विश्वकर्मा और ब्रह्मा तो एक ही है फिर विश्वकर्मा जी की प्रतिमा पृथक हो ही कैसे सकती है? ब्रह्मा जी की प्रतिमाएंे भी विष्णु अपेक्षा नगण्य ही मिलती है।
    हमारे मस्तिष्क में इस लेख के शीर्षकानुसार यह बात सदैव काम करती है कि ब्रह्मा जी क मंदिर में विश्वकर्मा जी और ब्रह्मा जी की प्रतिमा का सादृश्य जाना जाय। देश में विश्वकर्मा जी के मंदिर तो सैंकडों की संख्या में है और उनमें प्रतिमाएं भी अनेकों प्रकार की मिलती है परन्तु ब्रह्मा जी के मंदिर तो सम्पूर्ण भारत में मात्र दो स्थानों पर है राजस्थान के पुष्कर तीर्थ पर और गुजरात के खेड ब्रह्मा गांव में संयोग से खेड ब्रह्म गांव में एक विवाह संस्कार कराने का हमें 19 फरवरी 1980 का निमंत्रण मिला। हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया और दो मंत्रोंच्चारण करे वाले छात्रों को साथ लेकर हम खेडब्रह्मा पहंच गये। विवाह से निवृत्त होकर 20 फरवरी को हम तीनों ही नदी पार ब्रह्मा जी के मंदिर में गये इस गांव का नाम खेड ब्रह्मा, ब्रह्मा जी के मंदिर के कारण ही पडा है। वास्तु शास्त्र की दृष्टि से यह विशाल मंदिर हजारों वर्ष पुराना शिला खंडों को जोड़कर बनाया गया है।
    ब्रह्मा जी की प्रतिमा जिस सिंहासन पर प्रस्थापित की गई थी, वहीं प्रमुख गोलाकर भवन हमारा दर्शनीय स्थल था। पादत्राण विहीन होकर हमने मंदिर के प्रथम द्वार में प्रवेश किया जहां दानपात्र के साथ एक मुनीम जी बैठे थे उनसे प्रमुख पंडित का परिचय करके कुछ दक्षिणा देकर पंडित को बुलाने का आग्रह किया। कुछ काल की प्रतीक्षा के पश्चात धवल वेशधारी एक अधेड़ आयु के पंडित रामशंकर खांडेलवाल की प्रतीक्षा गण में प्रवेश हुआ आवश्यक अभिवादन के पश्चात हमने उन से प्रश्न किये। ब्रह्मा जी के चारों हाथ में क्या-2 है? उत्तर दाहिने ऊपर के हाथ में अमृतघट है, ऊपर के वाम हस्म में स्त्रच या स्त्रुवा है जिससे यज्ञाहुति दी जाती हैं। नीचे के दक्षिण हाथ में वेद अर्थात् ज्ञान की पुस्तक है और वाम हस्त में कमण्डल है। प्रश्न ये दाएं बांए देवियों कौन है? उत्तर-गायत्री और सावित्री हैं साथ ही उन्होंने यह श्लोक पढ़ा चतुर्वक्त्र चतुर्हस्तम हंस वाहन संस्थितम्। गायत्री सावित्री ब्रह्म देवी नमोस्तुते। अर्थात् चतुर्मुख वाले चार भुजा वाले जिनका वाहन हंस है और जिनके दाएं बाए गायत्री और सावित्री देवी स्थित है ऐसे ब्रह्म देव को नमस्कार हो। प्रश्न इनके वाहन हंस क्यों है? उत्तर हंस ज्ञान और बुद्धि अर्थात् विवेक का परिचायक है जिसे मेघा बुद्धि कहते हैं। ब्रह्मा जी ने तो वेद बनाएं है फिर हंस इनका वाहन क्यों नहीं होगा? प्रश्न-इनके दाढ़ी क्यों बनाई गई है? उत्तर - दाढ़ी वृद्धत्व का बोध कराती है ब्रह्मा जी चारों वेदों के ज्ञाता पूर्ण ज्ञानी थे। दाढ़ी ज्ञान वृद्ध की परिचायक है उन्होंने बताया सस्त्रों वर्ष पूर्व जब यह प्र्रतिमा स्थापित हुई तो देशभर के पंडित इकट्ठे हुए थे, उन्होंने अन्य देवों की तुलना में ब्रह्मा जी को पितामह सिद्ध किया था और प्रतिमा दाढ़ी बनाना आवश्यक बताया था। प्रश्न-विश्वकर्मा जी भी दाढ़ी है और वे भी हम वाहन है? उत्तर - ब्रह्मा जी और विश्वकर्मा तो एक ही है हमने पंडित जी के सामने विश्वकर्मा विश्वकर्मा अमत्पूर्व वह मणस्तव परातन वाला श्लोक बताया और विश्वकर्मा देव का स्वरूप निम्न प्रकार वर्णन किया। मंडन सूत्रधार कृत श्लोकः कम्बा सूत्राम्बुपात्रं वहति करतले पुस्त्क ज्ञानसूत्रं हंमारूढः त्रिनेत्रः शुभ मुकुटशिरा संर्वतो वृद्धकय     येन सृष्टं सकल सुरगृह राजहम्र्याहि हम्ये, देवोअसो सूत्रधारी जगदखिलहितः पातु वो विश्वकर्मा।।4।। वास्तु राजब्ललभ।
    अर्थ:- जो विश्वकर्मा देव का एक हाथ में कंवा (गज) दूसरे में सूत्र, तीसरे में जलपात्र कमण्डल चैथे में ज्ञान की भूल पुस्तक अर्थ वेद या शिल्प शास्त्र धारण करते है जो हंसा रूढ है जिनके तीन नेत्र है, जिनके सिर पर उत्तम मुकुट है जिनका शरीर सब और फैला है जिनसे तीनों लोक और देवो गृहों का निर्माण किया है जिसने सभी राजगृहों को बनाया है जो संसार का कल्याण करते है वह सूत्रधार विश्वकर्मा देव हम लोगों को रक्षा करें। इस प्रकार ब्रह्मा जी और विश्वकर्मा जी का सादृश्य सिद्ध हो गया है जो ब्रह्मा है वही विश्वकर्मा है, जो विश्वकर्मा है वही ब्रह्मा है।

    -पं. हरिकेश दत्त शास्त्री

उरी की आतंकी घटना पर विरोध जताती लेखनी


सीमा पर बम-आगज़नी, भारत मॉ की बर्बादी है।
सदियों से संकट में क्यूंकर, हम सबकी आजादी है?

मोदी जी कब तक वारों पर वार, मृत्यु का ताण्डव ये?
कौरव कब तब सक्रिय, निष्क्रिय योग्य समर्थी पाण्डव ये?


वारों पर ये वार, कहॉ तक सहने की तैयारी है।
बमों-गोलियों से, नित छलनी होती केसर क्यारी है।

सत्रह वीर जवानों के बलिदानों की, सौगन्ध लिए।
आतंकी प्रति-शांति के समझौतों की, दुर्गन्ध लिए।

आर-पार अब, कर देने की बारी देखो आई है।
जितने हुए शहीद, किसी का बेटा-पितु-पति-भाई है।

हमको है धिक्कार, हमारी शक्ति क्योंकर बंधन में।
पिछलग्गूपन-चाटुकारिता, दुश्मन के अभिनन्दन में।

नहीं सहा जाता अब ये सब, बहुत हुआ ढोंगी ड्रामा।
कायरता का भाव हृदय में, आख़िर क्या हमने ठाना?

अब निर्णय लेने की बारी, भारत का अभिनंदन है।
यह चीत्कार रुदन क्यों सेवक, रक्त-रंगित, दुख क्रंदन है?

पाकिस्तान गले का फंदा, इसको तो निपटाना है।
भारत की सेनाओं का, कुछ तो उपयोग बताना है।

अब कठोर निर्णय लेने की बारी आई , मोदी जी।
तुम पर है विश्वास देश को लाज बचाओ, मोदी जी।

-डॉ.पुनीत द्विवेदी "क्रान्तिकारी" (स्वरचित)
मो० 0930384191607869723847




 कश्मीर
कैसे कह दूं ये कश्मीर हमारा हैं।कैसे कह दूं वहां शांत वादियों का नजारा हैं।

जहाँ खेल होता हो खुनी हर दिनवो भारत माँ के लालो का हत्यारा हैं।।

नहीं चाहिए वो कश्मीर हमें हरगिज जिसने कई मांगो का सिन्दूर उजारा हैं।





एक बार फिर 17 शेरो को चन्द गीदड़ो ने
 साजिश करके मौत के घाट उतारा हैं।

दे रहा हो सारा देश गालियाँ पाकिस्तान कोलेकिन 
मेरे हिसाब से तो ये अपनी खामोशी का नजारा हैं।

महामहिम क्यों नही करते आदेश युद्ध का
या देश से ज्यादा आपको कुर्सी का मोह प्यारा हैं।

दे दो मुझको फांसी सरकारों के खिलाफ बोलने परलेकिन चुप नहीं बैठूंगा मैं 
क्योकि आज फिर उन्होंने किसी बहिन के भाई को मारा हैं।


एड.नवीन बिलैया

सामाजिक एवं लोकतांत्रिक लेखक

मो.:-9806074898

यह अमूल्य मानव शरीर हमें परमपिता परमेश्वर की अपार कृपा से प्राप्त हुआ है। इसका सदुपयोग करने के लिए हमें ईश्वर की आज्ञा के अनुरूप ही जीवन यापन करना चाहिए। सांसारिक कत्र्तव्यों को पूरा करते हुए हमें जीवन के आध्यात्मिक पक्ष को उपेक्षित न करना चाहिए। जीवन में ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल आचरण करने से न केवल हमारा जीवन ही सुख, शांति और सफलता से व्यतीत हो सकता है, अपितु मृत्यु के उपरांत हम मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी भी बन सकते हैं। मनुष्य जीवन का उद्ïदेश्य पशुओं की तरह केवल खाना, पीना, सो जाना अथवा संतान पैदा करना ही नहीं है। शारीरिक और सामाजिक उन्नति के साथ-साथ आत्मा के स्तर को ऊ ँचा उठाना है कि मनुष्य पक्षपात रहित न्याय अर्थात धर्माचरण करता हुआ सांसारिक भौतिक वस्तुओं को साधन मात्र समझे। मनुष्य जीवन का उद्ïदेश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष जीवन का चरम लक्ष्य है। यदि मनुष्य जीवन पाकर भी मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न न किया जाए, तो जीवन व्यर्थ है। मोक्ष शब्द मुच् धातु से बना है, जिसका अर्थ है छूटना। किससे छूटना? दुखों से। यह जन्म-मरण रूप दारुण दु:ख ऐसा विचित्र दु:ख है कि मनुष्य अविद्या के कारण इसी को सुख आनंद समझता है। संसार के जितने भी भोग्य पदार्थ हैं, वे सब दु:ख मिश्रित हैं। धन सम्पत्ति, वैभव, पुत्र परिवार आदि सुख के साधन हैं, तो दुख के माध्यम भी हैं। संयोग के साथ वियोग है। सम्पन्नता के साथ विपन्नता भी है, परंतु अविद्या के कारण मनुष्य इन्ही भोगों की प्राप्ति के प्रयत्नों में अपना जीवन खपा देता है, पर उसकी तृष्णा कभी शांत नहीं होती।
आनंद स्वरूप परमेश्वर के आनंद के समक्ष ये भौतिक सुख-सुविधाएं कोई महत्त्व नहीं रखती। परमेश्वर के आनंद अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिए चित्त की वृत्तियों को मोड़ देने की आवश्यकता पड़ती है। चित्त हमारे अंत:करण का एक भाग है, जिस पर हमारे जन्म-जन्मांतर के विचारों, कर्मों के संस्कार हैं। इनके कारण वह चंचलतापूर्वक उन-उन प्रवृत्तियों की ओर हमें अग्रसर करता है। ये चित्त की वृत्तियां बड़ी विचित्र हैं। इनको ऋषियों ने दो वर्गों में बांटा है- क्लिष्ट और अक्लिष्ट। क्लिष्ट अर्थात क्लेशों, दु:खों की ओर ले जाने वाली। अक्लिष्ट अर्थात् दु:खों से छुटकारा दिलाने वाली। इन दोनों प्रकार की वृत्तियों को निरुद्ध करने का नाम योग है। 'योगश्चित्त वृत्तिनिरोध:Ó। महर्षि पतञ्जलि ने योग के आठ अंग बताए हैं, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से प्रथम दो अंग तो साधक की उच्च नैतिक स्थिति से संबंध रखते हैं। यम और नियम क्या हैं? ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग की अनिवार्य योग्यताएं हैं, जिनका पालन किए बिना साधक की ईश्वर प्राप्ति की ओर गति नहीं हो सकती। यम पांच हैं- तत्राहिंंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा: यमा:।। अहिंसा- अर्थात् किसी के प्रति मन में भी वैर भाव न रखना। सत्य- जो वस्तु जैसी है, उसके प्रति वैसा ही दृष्टिकोण रखना। अस्तेय- स्वामी की आज्ञा के बिना किसी वस्तु का उपयोग न करना। ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्मप्राप्ति, विद्याप्राप्ति और वीर्यरक्षा। अपरिग्रह अर्थात अपनी आवश्यकता से अधिक संचय न करना। शौच- अंदर और बाहर की शुद्धि, संतोष अर्थात् पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात् ईश्वर कृपा से जो कुछ प्राप्त हो, उसमें संतुष्ट रहना, तप अर्थात- सुख-दु:ख, हानि लाभ, प्रतिकूल-अनुकूल परिस्थितियों में समान अवस्था में रहने का प्रयत्न करना। स्वाध्याय अर्थात् वेद-शास्त्रों और ऋषि मुनियों के बनाए हुए, आत्मा को ऊंचा उठाने वाले उत्तम ग्रंथों का अध्ययन करना, अपनी आंतरिक व व्यावहारिक स्थिति के बारे में चिंतन करते रहना। ईश्वर-प्रणिधान अर्थात् ईश्वर के प्रति समर्पण भाव। संसार में जितने भी भोग्य पदार्थ हैं, प्राप्त हुए हैं, वे सब परमेश्वर की अपार कृपा से ही प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार की भावना रखते हुए सदा ईश्वर के प्रति धन्यवादी होना। ये यम और नियम मनुष्य के जीवन को सफल और सुखमय बनाते हैं और योग प्राप्ति का अधिकारी भी बनाते हैं। इनका यथावत् पालन करने से ही व्यक्ति योग के शेष अंगों की सिद्धि कर सकता है।
मनुष्य के सामने दो स्थितियां हैं- एक तो सांसारिक सुख, सुविधाओं, विषय-वासनाओं और कुप्रवृत्तियों का मार्ग है, जो देखने में अच्छा है, किंतु इसका परिणाम अत्यंत दुखदायी होता है। इसे प्रेय मार्ग कहते हैं। दूसरा मार्ग योग और मोक्ष का मार्ग है, जो कण्टकाकीर्ण और ऊबड़-खाबड़ दिखाई देता है, परंतु इसका परिणाम परमेश्वर के साक्षात्कार द्वारा मोक्ष के आनंद को प्राप्त करना है- इसे श्रेय मार्ग कहते हैं। श्रेय मार्ग ही परम-पुरुषार्थ है।

अब प्रश्र उठता है कि क्या सांसारिक सुख-सुविधा जुटाने और उनका उपयोग करने में पाप है? इसका समाधान भी वेद भगवान प्रस्तुत करते हैं- ''तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:ÓÓ (यजु.) अर्थात समस्या उपभोग की नहीं, समस्या आसक्ति की है। जब हम परमेश्वर की कृपा से प्राप्त साधनों का मालिक स्वयं को समझने लगते हैं, तो हमारी प्रवृत्तियां बिगड़ती हैं, इसलिए परमेश्वर का आदेश है कि तुम भोग तो करो पर त्याग भाव से भोग करो। एक तो यह समझें कि यह शरीर या भोग सदा रहने वाला नहीं है, दूसरे यह परमेश्वर ने अपनी अपार कृपा से हमें प्रदान किया है। इस प्रकार की भावना बनने पर इसके दुरुपयोग का प्रश्र ही उत्पन्न नहीं होता।


सहदेव समर्पित 
सम्पादक शांति धर्मी मासिक पत्रिका 

पिछले दिनों हरियाणा मंे एक छोटी सी परन्तु बड़े ऐतिहासिक महत्त्व की घटना हुई। सरकार ने गुड़गाँव का नाम बदल कर गुरु ग्राम कर दिया। भाषा के दृष्टिकोण से गुड़गांव अशुद्ध है, अपभ्रंश है। निश्चय ही सरकार का उद्देश्य इसके ऐतिहासिक महत्त्व को उजागर करना भी रहा होगा। इस पर दो प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिलीं। आधुनिक पढ़े लिखे युवाओं की प्रतिक्रिया थी- नाम बदलने से क्या रोजगार मिल जाएगा? नाम बदलने से क्या होता है? दूसरी प्रतिक्रिया यह थी- टेलीविजन पर एक परिचर्चा के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर कह रही थीं- ठीक है, यह (महाभारत का इतिहास) एक साहित्य है, हम भी इसे पढ़ते हैं साहित्य के रूप में- यह कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है।
आधुनिक शिक्षा पद्धति से शिक्षित इतिहासकार इस पक्ष के हैं कि भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास एक मिथक मात्र है। रामायण और महाभारत को मिथक मानना इसी प्रवंचना का एक हिस्सा है। वाल्मीकीय रामायण भारतीय परम्परा में एक आर्ष ग्रंथ है, जिसे आप्त वचन के रूप में प्रमाण माना जाता है। यद्यपि इसमें समय समय पर अनेक प्रक्षेप हुए हैं, तथापि यह भारतीय इतिहास का एक प्रमुख स्रोत है। इसको मिथक कहना पाश्चात्य, यहूदी ईसाई पक्षपाती इतिहासकारों के लिए आवश्यक था। क्योंकि उन्हें अपनी यह बात मनवानी थी कि भारतवर्ष और इसकी संस्कृति उतनी प्राचीन नहीं है जितना भारत के लोग मानते हैं। और उन्हें इस तथ्य को भी दबाना था कि भारतवर्ष विद्या का आदि स्रोत है। पिछली दो पीढि़यों के आधुनिक शिक्षा पद्धति से शिक्षित इतिहासकारों ने वही सब पढ़ा है जो इन्हें आजादी के बाद पढ़ाया गया है। पश्चिमी लोगों ने भारत के लोगों को हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखने के लिए जो षड्यंत्र रचा था, वह भारत के कम्युनिष्ट विचारधारा के लोगों के अनुकूल था, क्योंकि उनके संस्थापक ने कहा था कि ‘भारतवर्ष का अपना कोई इतिहास नहीं है।’ इस झूठ को प्रमाणित करने के लिए उन्हें पाश्चात्यों का पका पकाया माल मिल गया। ‘शत्रु का शत्रु मित्र होता है।’ इस नीति के अनुसार उन्होंने उन सब बातों को स्वीकार कर लिया जो भारतीय संस्कृति के मूल पर कुठाराघात करती थीं। यदि ये पक्षपात रहित होते और इन्हें विदेशियों की बात ही ज्यादा अच्छी लगती होती तो ये फ्रैंच विद्वान् लुई जैकेल्यो की बात भी मानते जिन्होंने वर्षों भारत में रहकर यहाँ की संस्कृति ओैर इतिहास का अध्ययन किया और इस भूमि को विश्व सभ्यता का पालना लिखा। (बाईबिल इन इण्डिया)
आश्चर्य तो इस बात का है कि 150-200 वर्ष पहले तक रामायण, महाभारत व इसके इतिहास को किसी ने काल्पनिक नहीं माना। राम का काल त्रेता और द्वापर की सन्धि में था। वर्तमान में अट्ठाईसवीं चतुर्युगी का कलयुग चल रहा है। यदि राम को इसी 28 वें त्रेता और द्वापर की सन्धि में हुआ माना जाए तो राम को कम से कम 864000 (आठ लाख चैंसठ हजार वर्ष) होते हैं। किन्तु यह तो दुर्जनतोष न्याय है। भारतीय इतिहास के अनुसार रामायण का काल करोड़ों वर्ष पूर्व का है। वायु पुराण 70/48 ‘त्रेतायुगे चतुर्विंशे--’ के अनुसार राम चैबीसवें त्रेतायुग में हुए हैं। इस प्रकार राम को एक करोड़, इक्यासी लाख, पचास हजार वर्ष ;1,81,50000 हो चुके हैं।

हमारे देश में, और इस देश से सैंकड़ों/सहस्रों वर्ष पूर्व जाकर दूसरे देशों में रहने वाले इस देश के लोगों के बीच में राम का जन्मदिन रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। इसी मास में हनुमान जयन्ती भी मनाई। क्या कभी किसी काल्पनिक उपन्यास के पात्रों का जन्मदिन भी मनाया जाता है। क्या कभी किसी ने शरत् के ‘देवदास’ प्रेमचन्द्र की ‘निर्मला’ या जंगल बुक के ‘मोगली’ या ‘हैरी पाॅटर’ का जन्मदिन भी मनाया है?
ऐतिहासिक प्रमाणों के संदर्भ में इस प्रकार के इतिहासकारों को स्वामी दयानन्द ने मुंह तोड़ उत्तर दिया है। आर्यों के इस देश पर आक्रमण के झूठ के संदर्भ में वे लिखते हैं- किसी संस्कृत ग्रंथ में नहीं लिखा-- पुनः विदेशियों की बात कैसे माननीय हो सकती है।’ भारतीय इतिहास के अपने संदर्भ हैं और वे कुछ हद तक अब भी सुरक्षित हैं। गैर भारतीय संदर्भों से भारतीय इतिहास को समझने का प्रयास करना ऐसा ही है जैसे साईकिल पर बैठकर चांद पर पहुंचने का प्रयास करना। जब आर्यावत्र्त इतिहास बना रहा था, तब तक तो उनको लिखना भी नहीं आता था, और उन्होंने एक स्थान पर घर बनाकर रहना भी नहीं सीखा था।
ये पूर्वाग्रही इतिहासकार इतिहास की ‘वैज्ञानिक दृष्टि’  का बड़ा नाम लेते हैं, उस पर विचार कर लिया जाए कि वह वैज्ञानिक दृष्टि क्या है? भारतीय साहित्य में प्राप्त सहस्रों उल्लेखों को मिथक मानने वाले पाश्चात्य और माक्र्सवादी विचार के लोग स्वयं ही अवैज्ञानिक और दुराग्रही सिद्ध होते हैं। उनकी दृष्टि विदेशी लेखकों के लिखे गए 5-10 ग्रंथों से बाहर नहीं जा पाती। पक्षपात दोष से भरे हुए उन विदेशी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को विकृत करने के लिए जो षड्यंत्र और प्रयत्न किए उनसे नई पीढ़ी के अधिकांश भारतीय अपरिचित ही हैं। 19 वीं शताब्दी के लगभग मध्य में (2 फरवरी 1835 को) लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद् में भारत को गुलाम बनाने में आने वाली बाद्दाओं का उल्लेख करते हुए कहा था - ‘हम भारतीयों को तब तक गुलाम बनाने में समर्थ नहीं हो सकते जब तक हम उस देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रीढ़ तोड़ न दें। इसलिए मैं प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा हटाने का सुझाव देता हूँ। जब भारतीय सोचने लगेंगे कि विदेशी सामान और अंग्रेजी भाषा उनसे श्रेष्ठ है, तब वह देश अपना आत्मसम्मान और संस्कृति खो देगा और वह वैसा बन जाएगा जैसा अद्दीनस्थ देश हमें चाहिए।’
यहूदी वस्तुतः प्राचीन आर्यों के वंशज थे। जब उनमें अविद्या फैली तो वे अपना मूल भूल गए। वे अपने आप को सर्वश्रेष्ठ जाति मानते थे। वे लोग मानने लगे थे कि ईसा से 4004 वर्ष पूर्व आदम का जन्म हुआ था। इसके लिए लाटपादरी अशर ने संसार के इतिहास का तिथिक्रम निश्चित किया था। जब उन्होंने भारतीय इतिहास की प्राचीनता के बारे में सुना तो तो उन्हें लगा कि बाईबिल की मीनार गिर पडेगी। ¼Freder Bodmer The loom of Lan guage, NewYork-1944, p-174)
आक्सफोर्ड में कर्नल बोडन द्वारा संस्कृत के लिए चेयर स्थापित की गई। इसमें कर्नल ने बहुत धन दान किया। इसने 1811 ई0 में अपने वसीयतनामे में लिखा कि उसका इस चेयर के लिए इतना अधिक धन खर्च करने का उद्देश्य यह था कि ईसाई धर्मग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद किया जाए जिससे भारतीयों को ईसाई बनाने के कार्य में अंग्रेज आगे बढ़ें। (संस्कृत अंग्रेजी कोष- By Sir Monier Williams, Preface-1899) इस चेयर से संबंधित जिन इतिहासकारों को आज पाश्चात्य रंग में रंगे भारतीय इतिहासकार वैज्ञानिक दृष्टि वाले मानते हैं वे सब ईसाई मत के पक्षपाती थे और उनका एकमात्र उद्देश्य पारसी यहूदियों के साथ साथ भारतीय इतिहास और संस्कृति को विकृत करना था। विल्सन ने ‘हिन्दुओं की धार्मिक और दार्शनिक पद्धति’ पुस्तक में अपने अल्प ज्ञान के आधार पर भारतीय मान्यताओं का मजाक उड़ाया था। इसी प्रकार रोथ ने संवत् 1903 में वैदिक साहित्य और वेद का इतिहास नामक झूठा जाल ग्रंथ लिखा था। जान मूर का ग्रंथ  The Oriental Studies उसके प्रकाशकों के अनुसार ईसाई पादरियों के लिए अत्यंत उपयोगी था।
मैक्समूलर मैकाले से प्रभावित और कृतज्ञ था। यह वही व्यक्ति है जिसने ईसाई पक्षपात के कारण वेदों को गडरियों के गीत कहा था। हालांकि बाद में स्वामी दयानन्द के प्रभाव से निरुत्तर होने के कारण इसको अपने कथन में परिवर्तन करना पड़ा था, पर इसके ईसाई पक्षपात में कोई कमी नहीं आई थी। फ्रांस के विद्वान् लुई जैकोल्यो ने संवत् 1926 में एक ग्रंथ लिखा La Bible Dans L' inde ‘भारत में बाईबिल’ जैकोल्यो ने इस ग्रंथ में (डाॅ0 भवानीलाल भारतीय द्वारा संपादित इसका संक्षिप्त संस्करण घूड़मल ट्रस्ट हिण्डौन सिटी से प्राप्य है।) यह सिद्ध किया कि भारतवर्ष ही सब देशों की विद्या और संस्कृति का मूल है। जैकोल्यो ने भारतीय ब्राह्मणों के संपर्क में भारतीय इतिहास का गंभीर अध्ययन किया था। मैक्समूलर को यह सच्चाई सहन नहीं हुई। उसने कहा-‘जैकोल्यो अवश्य ही ब्राह्मणों के धोखे में आया है।’ मैक्समूलर के अनेक पत्रव्यवहार इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह हठी, पक्षपाती, विद्याशून्य और ईसाई मिशनरी था। 
वैबर भी इसी प्रकार का पक्षपाती स्काॅलर था। हम्बोल्ट ने गीता की प्रशंसा की। वैबर के लिए यह असह्य था। उसने गीता और महाभारत को बाईबिल के बाद का सिद्ध करने के लिए कहा- ‘गीता और महाभारत पर ईसाई सिद्धान्तों का प्रभाव है।’ (The History of SKT. Literature -1914 ) लोरिंशर और हाॅपकिन्स ने भी इसी कारण महाभारत को ईसा के बाद का सिद्ध करने के लिए घोर परिश्रम किया। बंगाल के लेखक बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय लिखते हैं- ‘भारत के लिए वह अशुभ घड़ी थी, जब वैबर ने संस्कृत का अध्ययन आरम्भ किया। जर्मन लेखक यह नहीं मान सकते थे कि ईसा के जन्म से सदियों पूर्व महाभारत रचा गया।’ (कृष्णचरित, तृतीय परिच्छेद)
यहूदी अध्यापक गोल्डस्टुकर ने वैबर और विहटलिंग के संस्कृत कोश में की गई अशुद्धियों की आलोचना की तो वैबर गालियों पर उतर आया। उसने लिखा कि ‘गोल्डस्टुकर का दिमाग पूरी तरह खराब हो गया है।’ गोल्डस्टुकर ने इस रहस्य को उजागर किया कि राथ, वैबर, बिहटलिंग, कूहन आदि लेखक कृतसंकल्प हैं कि भारत का प्राचीन गौरव नष्ट किया जाए। (पाणिनी का संस्कृत साहित्य में स्थान) मोनियर विलियम्स, रुडल्फ हर्नलि, विण्टरनिट्ज आदि संस्कृत के कथित विद्वान् न तो संस्कृत विद्या से परिचित थे और न पक्षपातशून्य। स्वामी दयानन्द तो कहते हैं कि वे लोग संस्कृत पत्रों का भी ठीक से अर्थ नहीं जान सकते हैं। उनके ग्रंथों के आधार पर संस्कृत साहित्य व इतिहास का अध्ययन करने वाले भारतीय यह कैसे जान सकते हैं कि इसके पीछे कितना बड़ा षड्यंत्र काम कर रहा था। स्वामी दयानन्द ने बूहलर, मोनियर विलियम्स, रुडल्फ हर्नलि और थीबो जैसे ‘विद्वानों’ के पूर्वाग्रह को पहचान लिया था। मद्रास विश्वविद्यालय के श्री नीलकण्ठ शास्त्री भी उनके षड्यंत्र को जान गए थे। भारत सरकार के लिपि विशेषज्ञ रहे सी0 आर0 कृष्णामाचार्लु ने भी इस षड्यंत्र का संकेत प्राप्त कर लिया था।
इस प्रकार के अल्प शिक्षित, पक्षपाती, दुराग्रही, वेदज्ञान शून्य ईसाई लेखकों के प्रभाव में आकर भारतवर्ष के सत्य इतिहास को मिथक या कल्पना कहने वाले मिथ्या अभिमानी लोग अपने आप को वैज्ञानिक दृष्टि वाला मानते हैं। भारत की आजादी के बाद भी यह ऐतिहासिक द्दोखाद्दड़ी निर्बाध जारी रही।
राष्ट्रवादियों के लिए यह गंभीर चिंतन का समय है। प्रश्न केवल राम या गुरुग्राम का नहीं है। यह प्रश्न भारतवर्ष के पूरे अस्तित्त्व का है। स्वामी दयानन्द ने वेदों के यथार्थ भाष्य पंजाब विवि में लागू करने का प्रयास किया, उसे सिरे नहीं चढ़ने दिया गया। इतिहासकार पं0 भगवद्दत्त ने पं0 नेहरू से इतिहास की धूर्तता की पोल खोलने के लिए पाश्चात्य प्रभाव से ग्रसित इतिहासकारों से खुली बहस करवाने की चुनौती दी, वह भी नहीं हो सका। आज यह स्थिति हो गई कि हमारे आदर्श पुरुष राम और कृष्ण भी काल्पनिक हो गए। संस्कृत के अध्ययन का निरन्तर हतोत्साहन इसी का हिस्सा है। यही कारण है कि आज की पीढ़ी कहती है कि नाम बदलने से क्या रोटी मिल जायेगी? स्वामी दयानन्द ने कहा था- कर्महीन तो हुए, नामहीन भी क्यों होते हो? भारत के लिए उसके अतीत का प्रश्न उसके भविष्य का प्रश्न भी है।


आधार
पं0 भगवद्दत्त: भारतवर्ष का बृहद् इतिहास
वैदिक वाङ्मय का इतिहास।
पण्डित लेखराम: सृष्टि का इतिहास
स्वामी दयानन्द: सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
पं0 रघुनन्दन शर्मा: वैदिक सम्पत्ति
स्वामी जगदीश्वरानन्द: वाल्मीकीय रामायण


सौजन्य से 
सहदेव समर्पित (9416253826)

अयोध्या दर्शन 



Ayodhya With little over 10 sq Km in area, lying on the banks of the river Ghagra or Saryu, this ancient city is believed to be the birth place of Lord Rama, the seventh incarnation of Lord Vishnu. The holy book of Hindus- the Ramayana- says, the city was founded by Manu. Later, it became the capital of the descendants of the Surya dynasty. Lord Rama was the most celebrated King of this dynasty. Known as ‘Kosaldesa’ in ancient times, the place has been described as “a city built by gods and being as prosperous as paradise itself”, in the Atharvaveda. From the time immemorial, this place has been noted for the performance of various rituals and Yajnas, including ‘Asvamedha Yajna’. From the epic and puranic ages, Ayodhya rose to prominence again in the 6th century B.C,the times of Buddha. Situated just about 10 Km from the district headquarters of Faizabad, Ayodhya is a city of temples of several religions. Various faiths have grown and prospered simultaneously and that also in different periods of time in the history. Jain traditions, for example, consider that five Tirthankaras were born at Ayodhya including Rishabhadeva, the first Tirthankar. Don’t miss the remnants of Buddhism, Hinduism, Islam and Jainism, that can still be found in Ayodhya.

Ayodhya is preeminently a city of temples yet, all places of worship here, are not only of Hindu religion. At Ayodhya several religions have grown and prospered simultaneously and also at different periods of time in the past.

Places to visit

-->


THE FAMOUS HANUMAN GARHI TEMPLE
HANUMAN GARHI

This is the most famous Temple of Ayodhya. It is 2 KM Far from the the Railway Station. Situated in the center of the town, this temple is approachable by a flight of 76 steps. Legend has it that Hanuman lived here in a cave and guarded the Janambhoomi or Ramkot. The main temple contains the statue of Maa Anjani, with Bal Hanuman seated on her lap. The faithful believe that all their wishes are granted with a visit to this holy shrine. Around this temple there is a huge amount of shopkeepers selling flowers and sweets.
A massive structure in the shape of a four sided fort with circular bastions at each corner houses a temple of Hanuman and is the most popular shrine in Ayodhya.



Kanak Bhawan
This has images of Sri Rama and Sita wearing gold crowns. It is also known as Sone-ke-Ghar.According to mythology in ancient time it a palace of gold. This palace was given to Sita by Kakai.




Ramkot


The chief place of worship in Ayodhya is the site of the ancient citadel of Ramkot which stands on an elevated ground in the western part of the city. Although visited by pilgrims throughout the year, this sacred place attracts devotees from all over India and abroad, on `Ram Navami’, the day of Lord’s birth, which is celebrated with great pomp and show, in the Hindu month of Chaitra (March-April).




Nageshwarnath Temple
The temple of Nageshwarnath is said to have been established by Kush the son of Rama. Legend has it that Kush lost his armlet, while bathing in the Saryu, which was picked up by a Nag-Kanya, who fell in love with him. As she was a devotee of Shiva, Kush erected this temple for her. It is said that this has been the only temple to have survived till the time of Vikramaditya, the rest of city had fallen into ruins and was covered by dense forests. It was by means of this temple that Vikramaditya was able to locate Ayodhya and the sites of different shrines here. The festival of Shivratri is celebrated here with great pomp and splendor.
Tulsi Udyan

Tulsi udyan is a beutiful garden created by the government. it is few far away from the Naya Ghat which is also created by government

Saryu River

Ayodhya Darshan starts only after the Saryu Snan
without saryu snan it is meant uncomplete.









Other places of interest
Rishabhadeo Jain Temple, Brahma Kund, Amawan Temple, Tulsi Chaura, Laxman Quila, Angad Tila, Shri Rama Janaki Birla Temple, Tulsi Smarak Bhawan, Ram ki Paidi, Kaleramji ka Mandir, Datuvan Kund, Janki Mahal, Gurudwara Brahma Kund Ji, Ram Katha Museum, Valmiki Ramayan Bhawan, are among other places of interest in Ayodhya.

Language : Hindi, Avadhi and English
Festivals : Shravan Jhoola Mela (July-August), Parikrama Mela (October-November), Ram Navmi (March-April), Rathyatra (June-July), Saryu Snan (October-November), Ram Vivah (November), Ramayan Mela.
Local Transport : Taxis/Tongas/Tempos/Buses/Cycle-Rikshaws.

RTI मलतब है सूचना का अधिकार - ये कानून हमारे देश में 2005 में लागू हुआ। जिसका उपयोग करके आप सरकार और
किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है। आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है।परंतु आज मैं आप को इस के बारे में कुछ और रोचक जानकारी देता हूँ -
RTI से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछकर सूचना ले सकते है।
RTI से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है।
RTI से आप दस्तावेज़ की प्रमाणित कापी ले सकते है।
RTI से आप सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना ले सकते है।
RTI से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते हैं।
RTI में कौन- कौन सी धारा हमारे काम की है।

धारा 6 (1) - RTI का आवेदन लिखने का धारा है।
धारा 6 (3) - अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है। तो वह विभाग
इस को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा।
धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता।
धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है
तो सूचना निशुल्क में दी जाएगी।
धारा 18 - अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उसकी शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए।
धारा 8 - इस के अनुसार वो सूचना RTI में नहीं दी जाएगी जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा हो या विभाग की आंतरिक जांच को प्रभावित करती हो।
धारा 19 (1) - अगर आप
की RTI का जवाब 30 दिन में नहीं आता है। तो इस
धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो।
धारा 19 (3) - अगर आपकी प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर दूसरी
अपील अधिकारी को अपील कर सकते हो।
RTIकैसे लिखे?
इसके लिए आप एक सादा पेपर लें और उसमे 1 इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप में अपने RTI लिख लें
..............................
.....
सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन।
सेवा में,
अधिकारी का पद / जनसूचना अधिकारी
विभाग का नाम.............
विषय - RTI Act 2005 के अंतर्गत .................. से संबधित सूचनाऐं।
अपने सवाल यहाँ लिखें।
1-..............................
2-...............................
3-..............................
4-..............................
मैं आवेदन फीस के रूप में 20रू का पोस्टल ऑर्डर ........ संख्या अलग से जमा कर रहा /रही हूं।
या
मैं बी.पी.एल. कार्डधारी हूं। इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल.कार्ड नं..............है।
यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से सम्बंधित
नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन सम्बंधित लोकसूचना अधिकारी को पांच दिनों के
समयावधि के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत
सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।
भवदीय
नाम:....................
पता:.....................
फोन नं:..................
हस्ताक्षर...................
ये सब लिखने के बाद अपने हस्ताक्षर कर दें।
अब मित्रो केंद्र से सूचना मांगने के लिए आप 20 रु देते है और एक पेपर की कॉपी मांगने के 2 रु देते है।
हर राज्य का RTI शुल्क अगल अलग है जिस का पता आप कर सकते हैं।
जनजागृति के लिए जनहित में शेयर करे।
RTI का सदउपयोग करें और भ्रष्टाचारियों की सच्चाई /पोल दुनिया के सामने लाईये
कृपया इस पोस्ट को अपने सभी ग्रुपो में ज्यादा से ज्यादा फॉरवर्ड करे और RTI को ज्यादा से ज्यादा उपयोगी और प्रभावी बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें।
 
 लेखक 
अज्ञात 
 
साभार 
प्रियांकु भटनागर
 
पतित पावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।
श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है।
.
एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
.
इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"
.
गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम
इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही
किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?
.
इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं पाया जा सका।
.
सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियां सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे
मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो स्वभाविक है।
.
वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी)
विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्शियम और
फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। वैज्ञानिक दृष्टि से हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है। इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।


हर हर गंगे



लेखक 
अज्ञात

साभार 
प्रियांकु भटनागर 
लेख भेजने के लिए