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समय के अंधेरो में खो गयी बलिदान गाथा - THe lost Sacrifice _ Indian Sahitya

 
 स्वाधीनता संग्राम के दौरान दे्य के अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों ने अपने-अपने तरीके से आंदोलन चलाया और कुर्बानियाँ दीं। इनमें से कई बलिदान गाथाओं, आंदोलनों को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में स्थान मिला, कुछ एक के सामान्य उल्लेख हुए; पर अनेक बलिदान गाथाएँ समय के अँधेरों में यूँ ही खो गई, व्यिेषकर पिछड़े, वनवासी और रजवाड़ों के इलाकों में हुए आंदोलनों को इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिला।
    सन् 1919 में पंजाब के जलियांवाला बाग में घटित नरसंहार जैसी मिसालें बहुत कम हैं, परंतु ऐसे ही नरसंहार और भी स्थानों पर हुए जिनसे दे्यवासी परिचित नही हैं। ऐसी घटनाओं में एक अमको-सिमको गोलीकांड व नरसंहार की घटना है, जिसके संबंध में आज 74 वर्ष बाद भी पूरी जानकारी नहीं है। इस गोलीकांड में 40 से अधिक वनवासी ्यहीद हुए थे और सैकड़ों घायल। यह निर्मम व क्रूर गोलीकांड जलियांवाला बाग घटना के बीस वर्ष बाद 25 अप्रैल, 1939 को उड़ीसा झारखंड सीमा पर स्थित राएबोगा थाना अंतर्गत अमको-सिमको गाँव (राउरकेला से लगभग 50 किलोमीटर दूर) में घटित हुआ था।
    उस दिन वहाँ स्वर्गीय निर्मल मुंडा के नेतृत्व में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने हेतु एक बड़ी सभा का आयोजन किया गया था। उस जनसभा पर ब्रिट्यि पुलिस ने गोलियों की वर्षा कर चालीस से अधिक लोगों को मृत्यु के हवाले कर दिया था। ब्रिट्यि पुलिस वास्तव में इस आंदोलन के प्रणेता निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से आई थी, परंतु उपस्थित जनसमूह ने पुलिस को कोई सहायता नहीं दी तो इससे क्षुब्ध होकर पुलिस ने इस वह्िययाना कांड को अंजाम दिया।
    वनवासियों द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए ्युरू किए गए इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर उतना महत्त्व नहीं मिला जितने का यह हकदार था। तत्कालीन गंगापुर राज्य (वर्तमान सुंदरगढ़ जिले का हिस्सा) में प्रारंभ हुए इस आंदोलन के पीछे वनवासियों की भूमि और सामाजिक अधिकारों पर राज्य का बढ़ता दबाव मुख्य कारण था। इस क्षेत्र में पहले जिस भूमि पर कर नहीं लिया जाता था, उस पर कर लगाने की व्यवस्था के विरुद्ध वनवासियों में आक्रो्य फैला था। सन् 1865 में पूरे क्षेत्र का राजस्व 5200 रुपए था। सन 1900 में यह बढ़कर 47700 रुपए और फिर सन् 1911 में हुए पहले भूमि बंदोबस्त में राजस्व 64257 रुपए तय कर दिया गया।
    पहले गंगापुर रियासत की गोड्डा भूमि पर कर नहीं लगता था परंतु सन 1935 के नए भूमि बंदोबस्त के बाद गोड्डा भूमि पर भी कर लगाने का निर्णय किया गया और सन 1937 से इसका भुगतान बाध्यकारी कर दिया गया। सन् 1923-24 में भूमि राजस्व 1,10,257 रुपए, सन 1932 में 1,49,861 रुपए कर दिया गया। मुंडा वनवासियों ने गांगपुर राज्य के इस निर्णय के विरुद्ध सन 1935 में गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को एक पत्र लिखा। स्वर्गीय निर्मल मुंडा इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। इन लोगों ने पत्र में गोड्डा भूमि पर प्रस्तावित कर में कमी करने के साथ छोटा नागपुर अंचल में प्रचलित खुंटकटी कानून को यहाँ भी लागू करने की मांग की। सन 1938 में यह आंदोलन पूरे गांगपुर राज्य में फैल गया। इसे कुचलने के लिए गांगपुर राज्य ने निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने का निर्णय किया और इसी के क्रम में वनवासियों पर दमनचक्र प्रारंभ हुआ।
    इसके प्रतिवाद में तथा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने के लिए 25 अप्रैल, 1939 को सिमको गांव में एक जनसभा का आयोजन किया गया। इसी अवसर पर गांगपुर पुलिस, रानी जानकी रत्ना साहिबा के निर्दे्य पर निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने सिमको गांव पहुंची। गांगपुर राज्य ने इसमें ब्रिट्यि पुलिस की मदद ली। इस जनसभा में तीन हजार से अधिक लोग एकत्रित हुए थे। ब्रिट्यि पोलिटिकल एजेंट ले0 ई0 डब्लयू0 एम0 मार्जर के नेतृत्व में पुलिस दल वहाँ पहुँचा और उन्होंने तीन ओर से घेराबंदी कर दी।
    पुलिस वास्तव में निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से सिमको पहुँची थी। इस बात का पता चलते ही लोग बेचैन हो गए और उन्होंने अपने नेता को बचाने का निर्णय कर लिया। पुलिस ने जब लोगों से निर्मल मुंडा के बारे में पूछा तो लोगों ने स्वयं को निर्मल मुंडा कहा। इससे क्षुब्ध होकर ले0 मार्जर ने जबर्दस्ती निर्मल मुंडा के घर में घुसने का प्रयास किया तो एक युवा लड़के मानिया मुंडा ने उस पर लाठी से प्रहार कर दिया। एक पुलिस वाले ने तत्काल उसके पेट में राइफल की संगीन घुसेड़ दी, जिससे वह वहीं ढेर हो गया। इसके बाद ब्रिट्यि पुलिस ने निहत्थे वनवासियों पर गोलियाँ बरसानी ्युरू कर दीं।
    पुलिस फायरिंग से 40 लोग ्यहीद हुए और सैंकड़ों लोग घायल हुए। पुलिस के भय से वनवासी जंगलों में भाग गए और वहाँ अनेक लोग जंगली जानवरों के ्ियकार हो गए। पुलिस ने निर्मल मुंडा व अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। ये लोग 15 अगस्त, 1947 को जेल से रिहा हुए। वनवासियों के इस बलिदान दिवस की स्मृति को बनाए रखने के लिए चंद स्थानीय वनवासी कार्यकर्ता, पूर्व विद्दायक स्वर्गीय धनंजय महांति, स्वर्गीय प्रो0 डी0 एन0 सिंह, भाजपा नेता क्यिुन साहू, महावीर अग्रवाल जैसे लोग इन ्यहीदों को सरकारी मान्यता दिलाने के लिए प्रयास करते रहे हैं, पर नतीजा कुछ नहीं निकला है।
    पूर्व सांसद फ्रिढ़ा टोपनो ने यहाँ स्मारक बनाने के लिए 22 लाख रुपए स्वीकृत किए थे। उन पैसों से यहाँ कुछ उन्नति के कार्य हुए। पर आज इसका स्वरूप बिगड़ा हुआ है। यहाँ लगाई गई प्रस्तर ्ियला के इर्द-गिर्द पेड़-पौधे उग आए हैं, बिजली यहाँ है नहीं।
    इस आंदोलन को सरकारी मर्यादा दिलाने के लिए संघर्षरत बिरसा मुंडा प्रतिमा समिति के अध्यक्ष बिजय टोपो ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को पत्र लिखकर वनवासियों की बलिदान गाथा एवं निर्मल मुंडा को समुचित सम्मान दिलाने हेतु कार्रवाई करने की मांग की। ज्ञातव्य है कि भारत की स्वाधीनता के रजत वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमत्री इंदिरा गांधी ने निर्मल मुंडा को स्वाधीनता सेनानी के रूप में ताम्रपत्र प्रदान किया था। सन् 2001 से इस बलिदान को अर्द्ध सरकारी मान्यता मिली। स्थानीय स्तर के छोटे अद्दिकारी 25 अप्रैल को आयोजित होने वाले समारोह में ्ियरकत कर एक औपचारिकता भर निभा देते हैं, परंतु आज 74 वर्ष बाद भी इस बलिदान दिवस को वह मान्यता नहीं मिली है, जो इसे मिलनी चाहिए। वनवासियों का यह आंदोलन, उनका बलिदान अनुसंद्दान का विषय है। इस ओर सरकार कोई कार्रवाई करे और इस आंदोलन से जुड़े सारे तथ्यों को सामने लाए तो यही अमको-सिमको गांव में ्यहीद लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। (सीनियर इण्डिया)

सतीश शर्मा

सौजन्य से : शांति धर्मी पत्रिका