अपने लेख, कविता, कहानियां अथवा अन्‍य लिखित सामग्री इस ब्‍लाॅग पर प्रकाशित करवाने बारे में हमें tiwarijai222@gmail.com पर ई-मेंल करें और हिन्‍दी साहित्‍य के उत्‍थान में अपना योगदान दें
नया क्‍या है
जारी हो रहा है

वैदिक सभ्यता है सिन्धु घाटी

प्रिय पाठकवृन्द! 
अंग्रेजों के आगमन से भारत में कई विषय नये ज्ञात हुए और कई भ्रांत धारणाएं भी प्रचलित हुईं।  उन्हीं में से एक बड़ी भयंकर है- आर्यों के विदेशी आक्रमणकारी होने की। कितने धूर्त थे पाश्चात्य लेखक जो भारत (उत्तर व दक्षिण) में फूट डालने के लिए आर्य और द्रविड़ जातियों की कल्पना कर आर्यो को आक्रमणकारी प्रचारित कर गये और हमारे प्रबुद्ध लेखकों की शक्ति व समय आज भी इस मिथ्या कल्पना को असत्य सिद्ध करने में ही व्यर्थ जा रहा है। इस षड्यंत्र का प्रभाव देखिये कि लोकमान्य तिलक व जवाहर लाल नेहरू जैसे देशभक्त भी स्वामी दयानन्द 1875 ई0 में इस विचारधारा का खण्डन कर चुके थे, पर दुर्भाग्य से तिलक जी अपने गुरू विष्णु शास्त्री चिपलूणकर (जो स्वामी दयानन्द के घोर विरोधी थे) के प्रतिश्रद्धा के कारण स्वामी दयानन्द के मत को नहीं मान पाये, जबकि पाश्चात्यों के वेदभाष्य को मानकर उत्तरी धू्रव को आर्योकी मूलभूमि लिख दिया। नेहरू जी तो थे ही भारतीय (वैदिक) परम्परा के विरोधी-सांस्कृतिक स्तर पर मुसलमान और शिक्षा से अंग्रेज।
    ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलते हुए अंग्रेजों (एडवर्ड टामस आदि) ने आर्य (जो शब्द वेद, रामायण, महाभारत आदि में विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है) जाति की कल्पना की और 1856 ई0 में काल्डवेल ने द्रविड़ जाति की भी कल्पना कर अपने सहयोगियों के साथ मिलकर द्रविड़ भाषा का व्याकरण तैयार किया। उन लोगों ने दक्षिण वालों के दिमाग में यह भी अच्छी तरह बिठा दिया कि उत्तर भारत वाले हिन्दी भाषा लोग तुम्हारे परम्परागत शत्रु है, जिन्होंने तुम पर अनेक तरह के अत्याचार करके तुम्हें दक्षिण की ओर धकेल दिया। 1921-22 ई0 में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई हुई तो धूर्तों ने उसे द्रविड़ सभ्यता कहकर उस पर आर्यो के आक्रमण का प्रचार किया अर्थात् एक झूठ को सत्य सिद्ध करने के लिए फिर झूठ बोला गया और बार-बार बोला गया झूठ कुछ समय बाद सत्य ही लगने लगता है।
    इसके परिणामस्वरूप उत्तर व दक्षिण भारत में विरोध बढ गया, जो अभी तक भी (हिन्दी का विरोध) जारी है। अंग्रेज यही तो चाहते थे, पर स्वतंत्र देश की सरकार को जो यह चाहना चाहिए। फिर अब भी वही झूठ क्यों लिखा-पढ़ा जा रहा है? सिन्धु सभ्यता की खुदाई के समय भारत विरोधी लोग दो दलों में बँट गये। कुछ इस सभ्यता को वैदिक सभ्यता से प्राचीन मानकर ताकि आर्यो की सभ्यता सबसे प्राचीन सिद्ध न हो इसे प्राकृत आपदा से नष्ट हुई बताने लगे। दूसरे इसे आर्यो के आक्रमण में नष्ट हुई बताने लगे, ताकि आर्य आक्रमणकारी थे, इस कल्पना पर मोहर लग सके। मोर्टियर ह्विलर ने इसका मुख्यता से प्रचार किया। पुरातत्ववेत्ता श्रीधर वाकणकर ने ह्विलर को आर्यो के आक्रमण् प्रमाणित करने की चुनौती, तो वह निरूत्तर हो गया और अपनी बात वापस ले ली, पर प्रचार का विष इतना फैल चुका था कि देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय व राम स्वामी पणिक्कर जैसे लोग इसी बात को लेकर उत्तर भारत (आर्यों) के विरोध में आदोलन करने लगे और आर्य द्रविड़ का संघर्ष ब्राह्मण-शूद्र के रूप में बदल गया। दक्षिण वालों के विरोध के कारण हिन्दी राष्ट्र-भाषा नहीं बन पाई। इससे सिद्ध होता है कि अन्दर का शत्रु बाहर वाले शत्रु से अधिक विनाश कारी होता है।
    उपर के विचारों में दोनो सिन्धु सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता मानते है, और आर्यो के द्रविड़ो का दुश्मन। सभ्यता के पतन के विषय में मतभेद है। यदि बाढ़ आदि किसी प्राकृत आपदा से ये नगर नष्ट हो गये और बाद में सुरक्षित बचे शेष लोगों ने उनके उपर पुनः नगर बसा लिये, तो वे पहले वालों के दुश्मन या विदेशी कैसे माने जाएँगे? क्या पुनः नगर बसाने के लिए विदेशियों का आना अनिवार्य है? फिर वर्तमान लोगों की ओर मरने वालों की बहुत सी परम्पराएं समान क्यों हैं?
    यदि आर्यो को आक्रमणकारी भी माना जाए, तो भी यह सम्भव नहीं है कि थोडे से समय में कुछ आर्य समस्त उत्तर भारत के द्रविड़ों को मार भगा देते और उसे इस तरह आबाद कर लेते कि द्रविड़ों का कोई भी चिह्न शेष न रहे। द्रविड़ों पर आर्यो के आक्रमण को मानो प्रत्यक्ष देखने वाले ये इतिहासकार यह नहीं बताते कि द्रविड़ों के देश का क्या नाम था, जिस पर आर्यो ने आक्रमण किया और द्रविड़ों ने अपने देश का नाम आर्यावर्त क्यों रखने दिया? जैसे शक, हूण, मुस्लिम आदि आक्रमणकारियों ने मिनांडर, मिहिरगुल, सिकन्दर, सेल्युक्स, कासिम, गजनवी, गोरी, तैमूर, बाबर, नादिक, अब्दाली आदि के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया, क्या कोई इतिहासकार आर्यो के भी आक्रमणकारी नेता का नाम बता सकता है?
    और क्या कारण रहा कि रामायण काल में आर्य राम वनवास के समय दक्षिण भारत में गये, तो दक्षिण वालो (तथाकथित द्रविड़ों ) ने उनका विरोध नहीं किया, अपितु उनकी सहायता की? दक्षिण वालों को द्रविड़ जाति कहने वाले लोग बताएं कि वर्तमान मान्यता के अनुसार अलग-अलग मानी गई (वास्तव में मानव) जातियों (वानर-हनुमान, सुग्रीव आदि; राक्षस-रावण-विभीषण आदि; पक्षी-जटायु, सम्पाति आदि) के लिए भी रामायण में राम की तरह आर्य शब्द का प्रयोग क्यों हुआ है? इनकी स्त्रियाँ भी इन्हें आर्यपुत्र क्यों कहती थी?
    यदि आर्यो ने द्रविड़ों पर विजय पाई थी, तो रामायण महाभारत आदि की तरह उस विजय का वर्णन करने के लिए कोई ग्रंथ क्यों नहीं लिखा अथवा अपने किसी भी ग्रंथ में उस विजय का उल्लेख क्यों नहीं किया? और द्रविड़ों के कौन से प्राचीन ग्रंथ में लिखा है कि वे उत्तर भारत में रहते थे और आर्यों ने उन्हें मार पीटकर दक्षिण में भगा दिया? क्या कारणर है कि महाभारत में ‘द्रविड़’ शब्द जाति के रूप में न होकर पाण्ड्य, उण्डू, केरल, आन्ध्र आदि की तरह देश (स्थान) वाचक है? आर्यो ने अपने साहित्य की इतनी वृद्धि की कि दक्षिण वालों में भी उनका प्रचार है, तो दव्रिड़ों का साहित्य कहां गया? उनका उत्तर भारत में प्रचार क्यों नहीं हुआ? और क्या कारण है कि वर्तमान में तथाकथित द्रविडों का इतिहास अगस्तय व कण्य आदि वैदिक ऋषियों से आरम्भ होता है?
    यदि आर्य दक्षिण वालों के दुश्मन थे, तो आर्यो के ग्रंथ वेदों को एक-एक मात्रा व स्वर को ध्यान में रखकर  कंठस्थ करने की परम्परा अभी तक भी दक्षिण भारत में क्यो है? आज भी द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी आदि नाम उन पंडितों के साथ क्यों जुड़ा हुआ है? और दक्षिण भारत की लगभग सभी भाषाओं में 50 से 90 प्रतिशत तक संस्कृत के शब्द क्यों है? बौद्ध, जैन, मत को परास्त कर वेद धर्म की पुनः प्रतिष्ठा करने वाले शंकराचार्य; भक्ति मार्ग का प्रचार करने वाले रामानुजाचार्य बसवेश्वर, वल्लभाचार्य स्वामी रामानन्द आदि को क्यों नही पता चला कि हम द्रविड़ों को आर्यों ने मार पीटकर दक्षिण में धकेला था? फिर भी वे आर्यो को परम्परा का प्रचार क्यों करते रहे? और भक्ति भी राम, कृष्ण आदि उत्तर भारत वाले आर्यो की इतने दुष्प्रचार के बाद भी दक्षिण वाले उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा क्यों करते हैं?
    वास्तविकता तो यही है कि आर्यों के प्राचीन साहित्य में उनकी विरोधी या समानता के रूप में कही भी द्रविड़ जाति का उल्लेख नहीं है। वहां तो दस्यु (सामाजिक नियम तोड़ने वाला ) शब्द मिलता है। वह भी गुणवाचक है, जातिवाचक नहीं। द्रविड़ शब्द महाभारत में राजसूय यज्ञ से पूर्व सहदेव की दिग्विज के समय) स्थान (कृष्णा और पोलर नदियों के मध्यवर्ती जंगली भाग के दक्षिण में स्थित कोरोमंडल का समस्त समुद्रीतट; जिसकी राजधानी कांची-कांजीवरम-मद्रास से 42 मील दक्षिण-पश्चिम में) उस स्थान के वासी होने से व्यक्ति भी द्रविड़ कहलाते थे। जैसे-पंजाब, बंगाल, बिहार आदि राज्यों के वासी ब्राह्मण आदि सभी पंजाबी, बंगाली, बिहारी भी कहे जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने आदि शंकराचार्य को द्रविड़ देशोंत्पन्न लिखा है। अर्थात् वे ब्राह्मण थे और द्रविड़ राज्य के होने से द्रविड़ भी कहे जा सकते हैं। भारत के राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ में भी द्रविड़ शब्द स्थानवाचक है, जातिवाचक नहीं।
    आज भी वेदों के शुद्ध और विभिन्न प्रकार के पाठ दक्षिण के ब्राह्मण ही करते है और ब्राह्मण आर्यों का मुख्य वर्ण है, तो फिर द्रविड ब्राह्मण आदि आर्य क्यों नहीं हैं? हां, मनुस्मृति (10-22) में अवश्य द्रविड़ जाति का उल्लेख है, पर ये श्लोक प्रक्षिप्त है और उस समय जोडे गये है, जब समाज में विभिन्न जातियां बन गई थी, सम्भवतः पुष्यमित्र शुंग के काल (150 ई0 पू0) में। स्मरण रहे, मनुस्मृति में वर्णित द्रविड़ जाति आर्यो की विरोधी नहीं, अपितु आर्यों के ही एक वर्ण क्षत्रिय (क्षत्रिय व्रात्य) से उत्पन्न सन्तान के रूप में झल्ल, मल्ल, नट आदि की तरह है।
    श्री के0 वी0 रामकृष्ण राव के अनुसार तमिल ‘द्रविड’ शब्द के प्रयोग से पुरातन काल में पूर्णतया अनभिज्ञ थे। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग आधुनिक काल से ही करना आरंभ किया है, विशेष रूप से तब, जब युरोपियन विद्वानों का दक्षिण में आगमन हुआ।
    1856 ई0 में काल्डवेल ने जो शरारत की थी, उस पर पानी फेरते हुए सर जार्ज कैम्पवेल नामक नृवंश वैज्ञानिक को उद्धृत करतेे हुए स्वामी विद्यानन्द जी ने लिखा है- ‘‘नृवंशशाास्त्र के आधार पर उत्तर और दक्षिण के समाज में कोई विशेष भेद नहीं है। द्रविड नाम की कोई जाति नहीं है। निस्संदेह दक्षिण भारत के लोग शारीरिक गठन, रीति-रिवाज और प्रचार व्यवहार में केवल एक आर्यसमाज है।’’
    मिस्टर म्यूर ने लिखा है- ‘‘जहां तक मुझे ज्ञात है, संस्कृत के किसी ग्रंथ में यहां तक कि प्राचीनतम साहित्य में भी आर्यों के विदेशी होने का संकेत नहीं मिलता।।’’ (आर्यो का आदि देश और  120/22)
    फिलाडेल्फिया निवासी डेल्स ने ह्विलर की धारणाओं के बीच के समय में कोई तालमेल नहीं है। आक्रमण और हत्याकाण्ड के प्रमाण मौजूद नहीं है।’’
    डॉ0 अम्बेडकर ने दलितो को भारतीय मूल का अनार्य और सवर्णों को आर्य आक्रान्ता मानने वालों का खण्डन करते हुए लिखा है- ‘‘यह धारणा गलत है कि आर्य आक्रमणकारियों ने शूद्रों को जीता। आर्यों के बाहर से आने और यहां के मूल निवासियों को जीतने की कहानी के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं है। भारत ही आर्यो का मूल निवास स्थान था।’’ (डॉ0 अम्बेडकर, राइटिंग एण्ड स्पीचेज खण्ड 3 पेज 420)
    अमेरिका के मानव वैज्ञानिक और पुरातत्ववेता डॉ0 जे0 मार्क के नोयर का मानना है कि सिन्धु घाटी आर्यों की ही सभ्यता है। इसी तरह बहुत सी देशी-विदेशी विद्वान तथाकथित आर्य व दविड़ जातियों व उनकेे परस्पर संघर्ष को झूठा सिद्ध कर चुके हैं। विश्व प्रसिद्ध मुस्लिम साहित्यकार अनवर शेख आर्यों के आक्रमण को बकवास घोषित कर रहे हैं। जब द्रविड जाति और आर्यो के आक्रमण ही काल्पनिक है, तो सिन्धु सभ्यता अपने आप वैदिक सिद्ध हो गई।
    भारतीय तकनीकी संस्थान (आई0आई0टी0) के शोधकर्ता आर0 बाला सुब्रहमण्यम ने बताया कि हड़प्पा और मौर्यकालीन दोनों वास्तुशिल्पों में 763 सै0 मी0 के माप का इस्तेमाल होता दिखता है।
    भारत में इसे पारम्परिक तौर पर अंगुलम के नाम से जानते है। उन्होंने कहा कि सिन्धु के किनारे बसने वाले लोग और गंगा के किनारे बसने वाले लोग एक थे। अप्रत्यक्ष तौर पर मैं कहूंगा कि आर्यो के आक्रमण का सिद्धान्त आधार हीन है। (पंजाब केसरी, 28 सितम्बर, 2009) हड़प्पा सभ्यता के बाट एक श्रृंखला में क्रमशः बढ़ते जाते थे। पहले वे 1,2,4,8, से 64 तक उसे गुने होते जाते थे और उसके बाद 160 से आगे सोलह के दशमिक गुणजों में 320, 640, 1600, 6400 (160 $ 4), 8000 (1600  5) और 12800 (16000  8) होते जाते थे। मजेदार बात तो यह है कि 16 या उसके गुणजों की परंपरा भारत में 1950 के दशक तक चलती रही है। सोलह छटांक का एक सेर होता था और 16 आने का एक रूपया। (प्राचीन भारत-श्री मक्खनलाल)
    सिन्धु सभ्यता से प्राप्त मूर्तियों से हडप्पा वासियों के कुछ रीति-रिवाजों की जानकारी मिलती है, वे हिन्दुओं (वैदिक का विकृत रूप) में आज भी प्रचलित है- पीपल के पेड़, सांड (नदी), शिवलिंग कमंडल, (साधुओं का लोटा), योगासन की भिन्न-भिन्न मुद्राएँ, सिंदुर से मांग भरी औरत, अस्थि-कलश आदि। कहीं-कहीं कंकाल भी मिले है। अत्यधिक निर्धनता या लकडि़यों के अभाव में अब भी कहीं कहीं हिन्दु दफनाते हैं। सन्यासियों को भी दफनाया जाता था। कालिबंगन में मिले एक पंक्ति में सात हवनकुण्ड इसे वैदिक सभ्यता ही सिद्ध करते है। इसके लिए सबसे पुष्ट प्रमाण मोहनजोदड़ों की खुदाई में प्राप्त एक सील (मुद्रा) है, जो अपनी कहानी स्वयं कह रही है। इस चित्र में एक वृक्ष पर बैठे दो पक्षी दिखाई दे रहा है। यह ऋग्वेद (1-164-20) की व्याख्या है कि प्रकृति रूपी वृक्ष पर दो पक्षी आत्मा-परमात्मा बैठे हैं। उनमें से एक (जीवात्मा) वृक्ष के फलों को खा रहा है, जबकि दूसरा केवल देख रहा है।
    वैदिक विद्वानों आचार्य उदयवीर व डॉ0 फतहसिंह ने इस सील का महत्त्व इतिहासकारों के सामने रखा, पर नेहरू सरकार ने इन्हें आर्य सभ्यता प्रमाणित करने से हतोत्साहित कर दिया। डॉ0 फतह सिंह ने सिन्धु-लिपि के 45 अक्षरों  करके 1965 ई0 तक 1500 सिन्धु मुद्राओं को पढ़ा और निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि सिन्धु मुद्राओं लिपि के ओम, उमा, इन्द्र, अग्नि, मित्र, वरूण आदि वैदिक शब्दों को पढ़ सके। उनका यह भी कहना था कि उपनिषदों के अनेक विचारों को सिन्धु मुद्राओं में चित्रित किया गया है।
    श्री सत्यपाल शर्मा ने 1967 ई0 में ‘सिन्धु सभ्यता के प्राचीन नगर’ पुस्तक में सिद्ध किया है कि मोहनजोदड़ों नगर के निर्माता मुंजवान पर्वत पर रहते थे, यह शब्द ऋग्वेद के मौजवत शब्द से लिया है। जब यहाँ के कुछ लोग मुंजवान पर्वत को छोड़कर सिन्ध प्रान्त में आकर बस गये, तो वे अपने आपकों मुंजान, मौंजान अथवा मोहझाल कहने लग गये। अब ये मोहचाल कहे जाते हैं। मोहझाल या मोंहजाल ब्राह्मण में यह परम्परा है कि उनके पूर्वज मंजवान(हिमालय) पर्वत पर रहते थे और सोमलता का व्यापार करते थे। व्यापार करने के लिए जब वे मेहत्न नदी के तट पर बस गये, तो उनका नदी वाचक नाम मेहते पड़ गया। इस प्रकार मौंजायन, मोहजाल और मोहंजोदड़ो समानार्थक ही है, जिनका अर्थ है मौज नगर जिनका घर (अयन, आलय, और दड़ो) है। (वेदवाणी, भाद्रपद सं0 2054 वि0)
    नेहरूवादी सरकार और इतिहासकारों ने इन विद्वानों के शोध की उपेक्षा की। अब उपेक्षित वैदिक विद्वानों की मान्यता को आगे बढ़ाते हुए भारत सरकार के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री विजयेन्द्र जी का एक नया शोध ग्रंथ  ज्ीम भ्ंतंचचंद ैबतपचज प्रकाशित हुआ है। प्रा0 श्री राजेन्द्र जिज्ञासु जी लिखते है कि आशा है विदेशी शासकों के वेतन भोगी इतिहास लेखकों द्वारा कल्पना से खड़ी की गई रेत की दीवार गिरकर रहेगी। (पं0 भगवद् दत जी पृ0 105)
    श्री वाकणकर की मान्यता के आधार पर सिन्धु सभ्यता को सरस्वती सभ्यता नाम दिये जाने की आवाज उठने लगी है, क्योंकि अब तक खोजी गई 1400 बस्तियों में से केवल 80 बस्तियाँ ही सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में पाई गई है। 1100 (80 प्रतिशत) बस्तियां सिंधु और गंगा के बीच के मैदान में स्थित हैं, जहां कभी सरस्वती नदी बहती थी। सरस्वती नदी की खोज (खुदाई) होने से इस विचार धारा को बल मिलेगा कि आर्यों के साहित्य में गंगा-यमुना तरह वर्णित पावन सरस्वती के तट पर आर्यो की ही बस्तियाँ थी। सरकार उत्साह दिखाए और देशवासियों का स्वाभिमान जगे,तो हमें विदेशों आक्रमणकारी बताने वाला मिथ्या इतिहास बदल सकता है।

सौजन्य :

शान्तिधर्मी मासिक पत्रिका

लेखक : राजेशार्य